Saturday, December 20, 2014

हमारी रेल......


हमारे देश में रोजाना लोग अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए, लाखों 
लोग नौकरी-पेशा, काम-रोजगार और आवागमन के लिए इस शहर से उस शहर का सफर तय करते हैं और इस सफर में उनको मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी अक्सर भारतीय रेल के कंधों पर ही बैठती है। 

भारतीय रेलें दिन भर में जितनी दूरी तय करती हैं, वह धरती से चांद के बीच की दूरी का लगभग साढ़े तीन गुना है। दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क्स में से एक और दुनिया की सबसे सस्ती रेल सेवाओं में शुमार भारतीय रेल पूरी तरह से सरकार के अधीन है। लेकिन आराम की सवारी की अपनी पहचान और रियायती सफ़र के हिसाब से अब यह बीते दिनों की बात होती जा रही है....

करीब 6 महीने पहले केंद्र में सरकार बदली, महंगाई पर वार की उद्घोषणा करती आई वादों और दावों के अम्बार वाली स्वप्नमयी सरकार ने  रेल बजट से कुछ दिन पहले ही रेल मालभाड़े में करीब 6.4 फीसद और रेल किराए में करीब 14.2 फीसद की वृद्धि का ऐलान कर दिया। वृद्धि को नैतिक और उचित स्वरुप का चोला ओढ़ाने के लिए तत्कालीन रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने इस संदर्भ में संस्कृत का यह श्लोक पढ़ा---- 
'यत्तदग्रे विषमिव परिणामे अमृतोपमम’’।
                                 अर्थात---- दवा खाने में तो कड़वी लगती है, लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है। देशवासियों को एक और स्वप्न दिखाया कि अब रेल यात्रा अप्रतिम होगी तमाम सुख-सुविधाओं से लैस यात्रा में उच्च गुणवत्ता का भोजन यहां मिल सकेगा, भविष्य में रेल में परेशानी नाम की चीज नहीं रहेगी... और इन तमाम बातों के साथ बढ़ा हुआ किराया उसी जनता पर लाद दिया गया जिसके महंगाई के बोझ तले दबने की चिंता में चुनाव पूर्व विपक्ष आधा हुआ जा रहा था.…। 
बढ़े हुए किराए और सुविधाओं के तमाम दावों के बावजूद रेल में सफ़र के दौरान खाने को लेकर यात्रियों की शिकायतें मिलती रही हैं। कभी खाने में छिपकली तो कभी कीड़े-मकोड़े।  23 जुलाई को कोलकाता राजधानी में भोजन में कॉकरोच पाया गया था। जांच में ट्रेनों में खराब गुणवत्ता का भोजन पाना सामने आया.... 

दिवाली के समय में जब रेल यात्रियों की भारी भीड़ थी, एक अक्टूबर  से आंशिक तौर पर गतिशील किराया प्रणाली को लागू करते हुए 80 ट्रेनों के तत्काल कोटे के आधे टिकट महंगे कर दिए गए, नई सरकार ने रेल किराए में बढ़ोतरी जिन दावों के साथ की उनकी हकीकत जब-तब बयान होती रही और दिवाली के अवसर पर प्रबंध कितने कारगर हैं यह भी खुलकर सामने आ गया जब त्यौहार मनाने की उम्मीद में कन्फर्म टिकट बावजूद यात्री टॉयलेट में सफर करने को मजबूर दिखे, क्योंकि डिब्बे में इतनी भीड़ हुई कि वे कई यात्री अपनी सीट तक नहीं पहुंच पाए। कन्फर्म टिकट के बावजूद जो लोग स्लीपर डिब्बे में नहीं जा सकते थे, उनमें से कई यात्री एसी डिब्बों में यात्रा कर रहे थे और ये आरोप भी लगे  कि कर्मचारी पैसे लेकर मजबूर लोगों को एसी डिब्बे में बिठा रहे थे। रेलवे ने बजाय कोई समाधान निकालने के अपने हाथ खड़े कर दिए और लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया। त्योहारों के मौसम में ट्रेन टिकटों के दाम ऐसे बढे, जैसे हवाई जहाज के टिकट हों और जिस दलील के साथ किरायों में बढ़ोतरी हुई कि सुविधाओं में बेहतरी होगी, दलालों से मुक्ति मिलेगी, लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। एक ही टिकट के लिए कोई कुछ दाम दे रहा था तो कोई कुछ और। 

अभी सुनने में आ रहा है, अगले साल के शुरू में रेल यात्रा महंगी हो सकती है। और फरवरी में पेश होने वाले रेल बजट में ऊर्जा की बढ़ती लागत का बोझ यात्रियों पर डालने के लिए रेल किरायों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया जा सकता है।  रेलमंत्री सुरेश प्रभु के अनुसार कुछ बोझ तो लोगों को उठाना होगा। लोगों  पर थोपा जाना कहाँ तक ठीक है वह भी तब जब सरकार महंगाई की मार पर वार करने के लिए सत्ता में आई है और दूसरी तरफ पूर्व में किराए में हुई आशातीत वृद्धि के बावजूद कोई सुधार नज़र नहीं रहे हैं... 

अब एक बार फिर छुटियों के दौर में जेब पर अटैक के लिए तैयार हो जाइए, क्रिसमस और नई साल को एन्जॉय करने के लिए घर से दूर जाना बड़ा महंगा पड़ने वाला है, अच्छे इंतजामों की गारंटी तो कौन लेगा वो अलग बात है...  विंटर ब्रेक के लिए भारतीय रेल सात नई प्रीमियम स्पेशल ट्रेनों के साथ तैयार है जिनमें टिकट बुक कराने के लिए यात्रियों को कुछ ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे, क्योंकि इनका किराया डायनमिक फेयर प्राइसिंग के आधार पर तय होता है। और एक बार कन्फर्म मिली टिकट को कैंसिल नहीं करा सकते, जब तक ट्रेन ही किसी वजह से रद्द न हो जाए। अपग्रेडेशन जैसी सुविधा इनमें नहीं है न ही कोई छूट या रियायत यात्रियों को मिलने वाली है...
तत्काल कोटे की आधी टिकटों के लिए डायनेमिक फेयर सिस्टम के तहत ऊंची कीमतें तय कर दी  गयी हैं, जिससे न सिर्फ गरीबों को  बल्कि मध्यम वर्ग को भी काफी परेशानी होती है उसका पूरा बजट गड़बड़ा जाता है। तत्काल टिकटों की व्यवस्था अंतिम समय पर यात्रा का फैसला करनेवालों की सहूलियत के लिए शुरू की गई थी, जिसका लाभ सभी वर्गों के यात्रियों को मिलता था।  लेकिन जिस तरह से मुनाफे के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है यह एक तरह से मजबूरी का फायदा उठाना ही है।

यदि रेलवे घाटे में चल रही है, उसे राजस्व जुटाना है, तो उसके लिए जरूरी नहीं कि यात्रियों पर इतना बोझ लाद कर उस घाटे को पूरा किया जाए इसके लिए रेलवे के सिस्टम में सुधार किया जाना चाहिए, बिना टिकट यात्रा करने वालों पर लगाम लगाई जानी चाहिये, रेलवे को चूना लगा रहे दलालों पर अंकुश हो, ऐसी अनेक बातें हैं जिन्हें हम सब जानते हैं और आए दिन उस हकीकत से दो-चार होते रहते हैं जिनसे रेलवे घाटे में रहता होगा..... 

60 हजार करोड़ की लागत से 500 किमी की दूरी पर बुलेट ट्रेन चलाने की बात करके हम भले ही विश्वस्तरीय होने का ख्वाब देख सकते हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि रोज 2  करोड़ तीस लाख यात्रयों को यात्रा कराने वाली, हर दिन 30  लाख टन माल की धुलाई करने वाली और करीबन 13  लाख कर्मचारियों को रोजगार मुहैया कराने वाली हमारी हमारी रेल प्रणाली करोड़ों देशवासियों के लिए सुकून भरी, सुरक्षित और विश्वसनीय हो तथा हर वर्ग की पहुँच बनी रहे... ट्रेनों में सफाई और व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी भी है, जिसके लिए नियमों का पालन करना और करवाया जाना बेहद जरूरी है...

रेल यात्रा हम सभी ने की है। शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने रेल यात्रा न की हो। छुक-छुक रेलगाड़ी क्या बच्चे, क्या बूढ़े सभी को लुभाती है। रेल सबको अपनी से लगती रहे, सुकून की यात्रा का अहसास देती रहे और आम जन की पहुँच में बनी रहे इसके लिए प्रयास जरूरी है ....ताकि लोग सफ़र करें suffer न करें....
जाते-जाते अशोक कुमार के गाने की चंद लाइने आप सभी के लिए जो 'देश का मेल: भारतीय रेल' की बात को बड़े दिलकश अंदाज में दर्शाती हैं....

रेल गाड़ी रेल गाड़ी
धरमपुर भरमपुर भरमपुर धरमपुर
मैंगलोर बैंगलोर बैंगलोर मैंगलोर
माण्डवा खंडवा खांडवा माण्डवा
रायपुर जयपुर जयपुर रायपुर
तालेगाँव मालेगाँव मालेगाँव तालेगाँव
बेल्लुर वेल्लुर वेल्लुर बेल्लुर
शोलापुर कोल्हापुर कोल्हापुर शोलापुर
हुक्कल डिण्डीगल डिण्डीगल हुक्कल
मस्लिपत्नम मस्लिपत्नम
ऊंगोल निथिगोल निथिगोल ऊंगोल
कोरेगाँव गोरेगाँव गोरेगाँव कोरेगाँव
ममदाबाद अमदाबाद अमदाबाद ममदाबाद
शोल्लुर कोन्नुर शोल्लुर कोन्नुर
छुक-छुक छुक-छुक
छुक-छुक छुक-छुक
बीच वाले स्टेशन बोलें
रुक रुक रुक रुक
रुक रुक रुक रुक

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