Sunday, July 6, 2014

निशाने पर मनरेगा



मनरेगा ने देश के ग्रामीण को, गरीब को क़ानून के रूप में काम की गारंटी दी है, 
सरकार को और प्रशासन को उसके लिए जवाबदेह बनाया है। मनरेगा ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है। यह दुनिया में अपनी तरह की सबसे बड़ी पहलों में से एक है।  

संसद ने गरीबों के लिए सर्वसम्मति से मनरेगा क़ानून बनाया था और इसके पीछे भावना थी कि जिनको काम की तलाश है, उन्हें यह कानून सरकार से काम प्राप्त करने का अधिकार देता है।  देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा महिलाएं इस क़ानून से लाभान्वित हुईं हैं, यह सही मायने में महिलाओं को सशक्त बनाता है।  इस क़ानून ने एक बेसिक परेशानी 'काम की तलाश में पलायन' को कम किया है और गरीब किसानों, मजदूरों और ग्रामीणों को उनकी स्थानीय जगह पर काम दिलवाकर उन्हें विश्वास देने के साथ-साथ बाहर जाने की समस्या से काफी हद तक निजात भी दिलाई है। मैं मानता हूँ कि कई साथी मेरी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे कि मनरेगा की वजह से रोजगार की गारंटी मिलने से ग्रामीणों के जीवन में बदलाव आया है, रोजगार के अवसरों में सृजन ने जीवनयापन को सुलभ बनाया है, ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था सुधारने में मनरेगा काफी सहायक भी सिद्ध हुआ है।

'मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 6 जून को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी को खत लिखा है कि क्या मनरेगा को एक्ट यानी कानून की जगह योजना में बदला जा सकता है। ग्रामीण रोजगार को क्यों किसी कानून के सहारे गारंटी की जानी चाहिए और क्या ऐसे रोजगार किसी योजना के जरिये नहीं दिए जा सकते।'  

इस क़ानून को क़ानून के बजाय योजना के रूप में लागू किए जाने का प्रस्ताव मात्र ही उस भावना की ह्त्या होगी जिसके साथ यह क़ानून अस्तित्व में आया।  क़ानून के लागू होने में कमियां होना, उसमें किसी तरह का भ्रष्टाचार पाया जाना उसे ख़त्म करने का उचित तर्क नहीं हो सकता कमियां दूर की जानी चाहिएं, सरकार को जहा-जहां खामियां हैं उन्हें दुरुस्त करना चाहिए लेकिन किसी प्रकार के भ्रष्टाचार के होते, अव्यवस्थाओं के चलते, कमियां पाए जाने की वजह से  इसके मूल स्वरुप में छेड़छाड़ करके गरीब को, ग्रामीण को रोजगार की गारंटी देने वाले इस महत्वपूर्ण क़ानून को समाप्त किए जाने का सुझाव देना अमान्य है, यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है  यह सरकार का न सिर्फ कर्तव्य है बल्कि उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी है कि वह व्याप्त तमाम कमियों को दूर करने का प्रयास करे और क़ानून जो भी क़ानून के दायरे में रोजगार प्राप्ति का पात्र है उसे काम दिया जाना सुनिश्चित करे बजाय उसे समाप्त कर देने के ताकि यह इसी तरह आजीविका यानि रोजगार का साधन बना रहे 

रोजगार के लिए इस क़ानून के अस्तित्व में आने से पहले कई तरह की रोजगार योजनाएं देश में थीं लेकिन वे उस उद्देश की प्राप्ति में असमर्थ रहीं इसीलिए इसकी आवश्यकता पडी और यूपीए ने देश के करोड़ों लोगों को गारण्टी के साथ काम का हक़ दिया  

मेरा मानना है कि राजनैतिक विद्वेष की वजह से, या किसी क़ानून में व्याप्त खामियों की वजह से या उसके लागू होने में किसी प्रकार की भी गड़बड़ियों की वजह से उसके मूल स्वरुप को समाप्त किया जाना सर्वथा उन  करोड़ों लोगों के साथ खिलवाड़ और अन्याय होगा जिनके लिए यह आजीविका, जीवनयापन और रोजगार का पर्याय है। आम जन को सीधा लाभ देने से जुड़ी, सामाजिक सुरक्षा से सम्बंधित योजनाओं को निशाने पर लिया जाना अतार्किक है इसका कोई औचित्य नहीं है 

4 comments:

  1. इस कानून की समाप्ति ग्रामिण अर्थव्यवस्था के साथ एक तरह का खिलवाड़ होगा

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  2. One of the most popular programs of employment in the India.

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  3. Very Sensitive depiction of the insensitive intentions of CM Vasundhra Raje .

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