Thursday, July 10, 2014

बजट नहीं दिखा मोदीमय


प्रचंड बहुमत के साथ हिन्दुस्तान की सत्ता पर काबिज़ हुई NDA सरकार ने अपने 45 दिन के समय में, 5 साल के कार्यकाल का पहला बजट  देश की जनता के सामने रख दिया। कुछ बातें जो इस बजट में साफ़ दिखाई देती हैं उन्हें आप सभी के साथ बांटना चाहता हूँ।

सबसे पहली बात NDA सरकार के इस बजट में तुष्टिकरण की झलक देखने को मिली, अधिकाँश को कुछ न कुछ दिया जाना (चाहे वो तर्कसंगत हो या न हो, पर्याप्त हो चाहे न हो)  बजट ने किसी को यह कहने का मौक़ा नहीं दिया कि फलां- फलां का बजट में ख्याल नहीं रखा गया। मेरा कहने का यह मतलब कतई नहीं है कि कोई भी, सरकार से, वित्तमंत्री से या उनके नुमाइंदों से सवाल नहीं कर सकता लेकिन इससे अभिप्राय यह है कि उनके पास जवाब रहे ऐसा प्रबंध उन्होंने बजट में किया है।

बजट में जहां वेतनभोगी वर्ग के लिए आयकर में छूट की सीमा बढ़ाई गई है, वहीं निवेश पर छूट की सीमा में भी इजाफा किया गया है, लेकिन यह जितने बड़े स्वागत योग्य कदम की तरह लिया जा रहा है उसका उतना लाभ मिलता नहीं दिखता उदाहरण के लिए इनकम पर टैक्स में छूट से 2.5 लाख सालाना कमाने वाले को व्यक्ति को महज 3996 रु प्रतिवर्ष और 40 हजार प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति को सालाना महज 5004 रूपये का ही लाभ होगा। टैक्स स्लैब में और ज्यादा छूट दी जानी चाहिए थी, मंहगाई से त्रस्त जनता को राहत देने के लिए जैसा कि सभी उम्मीद कर रहे थे। यहां ये बात भी ध्यान देने वाली है, जनता के सामने भाषण देते समय बीजेपी के नेताओं ने ही इसे 5 लाख तक किए जाने का तर्क दिया था।

वरिष्ठ नागरिकों के मामले में 3 लाख रुपये तक की सालाना आय को कर मुक्त किए जाने का प्रावधान निश्चित रूप से सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने के लिए ही किया है, यह ऐसी पंक्ति है जो अगला बजट आने तक वरिष्ठ नागरिकों के जिक्र के समय दोहराई जाती रहेगी।

बजट में सिगरेट, तंबाकू, पान मसाला, गुटका और शीतेल पेय पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर इन्हें मंहगा किया जाना स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी तारीफ़ किया जाना अतिश्योक्ति होगी क्योंकि हर प्रबुद्ध व्यक्ति जानता है अगर वो बजट बनाता तो इन मदों पर कर बढ़ाए ही जाने थे।

चुनावों से पहले भाजपा FDI की धुर विरोधी रही लेकिन आज रक्षा जैसे अतिमहत्वपूर्ण क्षेत्र और बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी FDI लाए जाने और दो दिन पहले घोषित रेल बजट  में निजीकरण की बात करके बीजेपी ने उस वर्ग के साथ तो खिलवाड़ किया ही है जो इनके तत्कालीन विरोध से प्रभावित हुई होगी। रक्षा में 49% FDI सिरदर्द बन सकती है।

विभिन्न मदों में बजट का प्रावधान भी ट्रिकी है जैसे सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए 200 करोड़ (वैसे इसके  लिए बजट न रखा जाकर उनके नाम से किसी योजना के अंतर्गत बजट रखा जाना देश और जनता के ज्यादा हित में होता) जबकि महिला सुरक्षा के नाम पर 150 करोड़ मात्र, बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ जैसी योजना के लिए महज़ 100 करोड़ का प्रावधान रखा गया है, नदियों को जोड़ने की योजना जिसे बीजेपी वाजपेयी जी के समय का हवाला देते हुए बेहद महत्वाकांक्षी  योजना के तौर पर पेश करती रही उसके लिए 100 करोड़ का बजट प्रावधान है।  मंहगाई  से राहत के लिए 500 करोड़ का अलग से फंड बनाने की क्या जरूरत थी, बजट में ही जनता को राहत दे देते।

जिन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं, उन्हें बजट में विशेष महत्त्व साफ़ मिलता दिख रहा है, मैट्रो परियोजना का काम तो राजस्थान में भी चल रहा है लेकिन अहमदाबाद (बुलेट ट्रेन के बाद) और लखनऊ में मैट्रो के लिए ही बजट प्रावधान रखा गया है, अब इसे बीजेपी किस तरह तर्कसंगत ठहराती है ये देखने वाली बात होगी।

मंहगाई, भ्रष्टाचार, युवाओं को रोजगार के अवसर, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों की बजट में अनदेखी ही की गयी है।

बजट की निराशाजनक शुरुआत (पूर्व सरकार की यथासंभव आलोचना) के साथ ही वित्तमंत्री अर्थव्यवस्था की बदतर स्थिति का हवाला देते रहे, वैश्विक परिदृश्य (ईराक संकट) और घरेलु परिस्थियों (मानसून में देरी, मंहगाई, जमाखोरी आदि)  की आड़ में वे कहते नज़र आए कि मेरे हाथ बंधे हुए हैं, सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव भी बाजार कि अनिश्चितता को बताता रहा। यह आम आदमी का बजट न होकर पूंजीपतियों का, FDI का बजट है।

कुल मिलाके ये बजट ऐसा किसी भी ऐंगल से नज़र नहीं आता जिसे कि मोदी का विकास बजट कहते हुए प्रचारित किया जा सके।

Sunday, July 6, 2014

निशाने पर मनरेगा



मनरेगा ने देश के ग्रामीण को, गरीब को क़ानून के रूप में काम की गारंटी दी है, 
सरकार को और प्रशासन को उसके लिए जवाबदेह बनाया है। मनरेगा ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है। यह दुनिया में अपनी तरह की सबसे बड़ी पहलों में से एक है।  

संसद ने गरीबों के लिए सर्वसम्मति से मनरेगा क़ानून बनाया था और इसके पीछे भावना थी कि जिनको काम की तलाश है, उन्हें यह कानून सरकार से काम प्राप्त करने का अधिकार देता है।  देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा महिलाएं इस क़ानून से लाभान्वित हुईं हैं, यह सही मायने में महिलाओं को सशक्त बनाता है।  इस क़ानून ने एक बेसिक परेशानी 'काम की तलाश में पलायन' को कम किया है और गरीब किसानों, मजदूरों और ग्रामीणों को उनकी स्थानीय जगह पर काम दिलवाकर उन्हें विश्वास देने के साथ-साथ बाहर जाने की समस्या से काफी हद तक निजात भी दिलाई है। मैं मानता हूँ कि कई साथी मेरी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे कि मनरेगा की वजह से रोजगार की गारंटी मिलने से ग्रामीणों के जीवन में बदलाव आया है, रोजगार के अवसरों में सृजन ने जीवनयापन को सुलभ बनाया है, ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था सुधारने में मनरेगा काफी सहायक भी सिद्ध हुआ है।

'मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 6 जून को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी को खत लिखा है कि क्या मनरेगा को एक्ट यानी कानून की जगह योजना में बदला जा सकता है। ग्रामीण रोजगार को क्यों किसी कानून के सहारे गारंटी की जानी चाहिए और क्या ऐसे रोजगार किसी योजना के जरिये नहीं दिए जा सकते।'  

इस क़ानून को क़ानून के बजाय योजना के रूप में लागू किए जाने का प्रस्ताव मात्र ही उस भावना की ह्त्या होगी जिसके साथ यह क़ानून अस्तित्व में आया।  क़ानून के लागू होने में कमियां होना, उसमें किसी तरह का भ्रष्टाचार पाया जाना उसे ख़त्म करने का उचित तर्क नहीं हो सकता कमियां दूर की जानी चाहिएं, सरकार को जहा-जहां खामियां हैं उन्हें दुरुस्त करना चाहिए लेकिन किसी प्रकार के भ्रष्टाचार के होते, अव्यवस्थाओं के चलते, कमियां पाए जाने की वजह से  इसके मूल स्वरुप में छेड़छाड़ करके गरीब को, ग्रामीण को रोजगार की गारंटी देने वाले इस महत्वपूर्ण क़ानून को समाप्त किए जाने का सुझाव देना अमान्य है, यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है  यह सरकार का न सिर्फ कर्तव्य है बल्कि उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी है कि वह व्याप्त तमाम कमियों को दूर करने का प्रयास करे और क़ानून जो भी क़ानून के दायरे में रोजगार प्राप्ति का पात्र है उसे काम दिया जाना सुनिश्चित करे बजाय उसे समाप्त कर देने के ताकि यह इसी तरह आजीविका यानि रोजगार का साधन बना रहे 

रोजगार के लिए इस क़ानून के अस्तित्व में आने से पहले कई तरह की रोजगार योजनाएं देश में थीं लेकिन वे उस उद्देश की प्राप्ति में असमर्थ रहीं इसीलिए इसकी आवश्यकता पडी और यूपीए ने देश के करोड़ों लोगों को गारण्टी के साथ काम का हक़ दिया  

मेरा मानना है कि राजनैतिक विद्वेष की वजह से, या किसी क़ानून में व्याप्त खामियों की वजह से या उसके लागू होने में किसी प्रकार की भी गड़बड़ियों की वजह से उसके मूल स्वरुप को समाप्त किया जाना सर्वथा उन  करोड़ों लोगों के साथ खिलवाड़ और अन्याय होगा जिनके लिए यह आजीविका, जीवनयापन और रोजगार का पर्याय है। आम जन को सीधा लाभ देने से जुड़ी, सामाजिक सुरक्षा से सम्बंधित योजनाओं को निशाने पर लिया जाना अतार्किक है इसका कोई औचित्य नहीं है