Thursday, December 12, 2013

आखिर क्या दिशा दे रहा है युवा राजनीती को.....?

राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजे एक ओर जहां चौंकाने वाले हैं वहीं दूसरी तरफ ये आत्मंथन और चिंतन का विषय है लेकिन न सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए अपितु यह उस मतदाता वर्ग के लिए भी चिंतन का विषय है जिसने विकास को एक सिरे से खारिज करते हुए सिर्फ एक पार्टी को लगभग पूर्ण जनसमर्थन दिया...

क्या ये एक ऐसा दौर नहीं है जिसमें काम करने वाला राजनीतिक दल, विकास की दूरगामी सोच रखने वाले व्यक्तित्व और उसी दिशा में दिन-रात एक करके राजस्थान जैसे सामान्य प्रदेश को रिफाइनरी, मैट्रो रेल, सोलर हब जैसे अन्य अत्याधुनिक विकास के आयाम प्रदान करने के बाद यह सोचने को मजबूर करे कि क्यूँ उसने सिर्फ मार्केटिंग, पैकेजिंग और बड़ी-बड़ी बातें करना नहीं सीखा...

यह आत्ममंथन का समय है उस नए मतदाता, युवा वर्ग और कुछ हद तक बुद्धिजीवियों के लिए भी कि क्या वे राजनेताओं को ये दिशा-निर्देश देना चाहते हैं कि वे सिर्फ लच्छेदार बातें करना, बड़े वादे करना भर सीख लें और नकारात्मक राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप का ही सहारा लें और उसके साथ ही हम उन्हें सत्ता में बिठा देंगे... क्या यह राजनीती में इस सोच को जन्म देगा कि पांच साल तुम चुप रहो पांच साल हम चुप रहे, चुनाव आते ही एक-दूजे की बखिया उधेड़ेंगे इत्मीनान से...!!!

क्या सबक लेंगे राजनेता इन चुनावी अभियानों से कि वे यदि सत्ता में हैं तो भविष्य में फिर से जनसमर्थन हासिल करने के लिए उन्हें अपने कार्यकाल में किए गए विकास और जनकल्याणकारी कार्यों के आधार पर, उपलब्ध संसाधनों का आंकलन कर भविष्य के लिए रणनीति बनाते हुए,  भविष्य की सम्भावनाओं के देखकर विकास के दावो और वादों के साथ आने वाले समय में जनसमर्थन मांगने से कोई लाभ नहीं होगा वहीं ऐसे राजनीतिक दल जो कभी अपने काम की तुलना किए बगैर सिर्फ आरोप की राजनीती के जरिये उसमें कामयाब हो जाएं...

मैं पूछना चाहता हूँ नई पीढ़ी से आप सभी की बातें सुनते हैं, वायदे सुनते हैं, हर बात की समीक्षा करने की बुद्धिमता आपके पास है... ऐसा होते हुए भी एक राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणा पत्र में 5 लाख रोजगार देने की बात करता है वहीं विपक्ष रहा दल 10 -15  लाख युवाओं को या ये कहें हर युवा को रोजगार की बात करता है तो आप उससे ये क्यूँ नहीं जानना चाहते कि.… 
  • उसका आधार क्या है..? 
  • आखिर उनकी ऐसी कौनसी नीतियां रहेंगी जिनसे ऐसा सम्भव हो पाएगा... 
जब विपक्ष ने महज 6 माह पहले जनता के सामने कमियां गिनाना शुरू किया तो क्या मतदाता का फर्ज नहीं बनता कि वो सोचे और प्रश्न करे कि जब आप वाकई हमारा भला चाहते थे, आप सरकारी नीतिओं से खिन्न थे तो क्यों आप पूरे समय सरकार को आगाह नहीं करते रहे, और आज चुनाव के अतिनजदीक आते ही आपको हमारा साथ चाहिए... 
जबकि हम स्वयं जानते हैं यह सम्भव नहीं है, यहाँ तक कि विकसित देश में भी ये सम्भव नहीं है इससे आज का युवा भलीभांति परिचित है... कांग्रेस ने वायदा किया तो आधार के साथ किया... आज प्रदेश में रिफाइनरी की जो नीव रखी गयी है वह अकेले ही 2 लाख हाथों को रोजगार देगी, मैट्रो रेल परियोजना महज एक नए युग की शुरुआत भर नहीं है इससे भी बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित होंगे... हर हाथ को कोई सरकार काम नहीं दे सकती, जितना सम्भव है किया गया, साथ ही अधिकतम रोजगार के अवसर सृजित हों ऐसे दूरगामी निर्णय लिए गए.. यह राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में इसी तरह है जैसे एक मध्यम वर्गीय परिवार में दिन-रात काम करके अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी परिस्थितियां देते हैं जिससे उनका भविष्य उज्जवल हो इसी तरह ऐसे अनेक कदम कांग्रेस सरकार ने उठाए जिन्हें पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया जिससे प्रदेश की नई पीढ़ी का भविष्य उज्जवल होगा और उसे न सिर्फ रोजगार मिलेंगे बल्कि स्वयं सशक्त होने के साथ अन्य हाथों को भी काम दे सकेगा... चाहे स्वरोजगार के लिए 150 करोड़ की लागत  से 2.7  लाख युवाओं को निःशुल्क प्रशिक्षण, युवा उद्यमिता प्रोत्साहन योजना के तहत  प्रदेश के नौजवानों को अपने उद्यम के लिए आसान शर्तों पर बड़ी आर्थिक सहायता देना, उच्च शिक्षा के लिए छत्रवृत्तियां, प्रदेश में विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों की स्थापना, विश्व स्तरीय कम्पनियों द्वारा अभूतपूर्व  निवेश की बात की जाए, क्या यह सब हमारे प्रदेश को एक नई पहचान दिलाने साथ ही रोजगार की दिशा में आशातीत अवसरों की सम्भावना नहीं देता है... मगर नहीं आमजन ने उस मध्यम वर्गीय परिवार में बेहतर कल की उम्मीद में संकल्पबद्ध होकर किए जा रहे प्रयासों को नकार दिया और हवा में, बिना किसी आधार के, लुभावने वादों को बिना आंकलन किए जनमत  किसी और प्रदान किया...

चुनाव अभियान में आरोपों का एक मुख्य बिंदु रहा कि सरकार रेवड़ियां बाँट रही है, क्यों पूरे समय विपक्ष ने सरकार पर दबाव नहीं डाला कि अमुक कार्य होना चाहिए और अमुक नहीं..  सभ्य समाज के लोग और दबाव समूह अपने स्तर पर सर्वे करते और जानते जमीनी हकीकत को कि---
  • कितनी जनता मुफ्त दवा चाहती है, निःशुल्क जांच चाहती है... 
  • वृद्धों को, विधवाओं को, बेरोजगारों को पेंशन की और छात्रों को छात्रवृत्ति की आवश्यकता है भी या नहीं,
  • प्रदेश में महिलाएं निःशुल्क प्रसव चाहती हैं या नहीं...
  • गरीब को सस्ता खाद्यान दिया जाना जरूरी है या नही...
  • प्रदेश के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को साइकिल और लैपटॉप मिलने से उनके साथ ही कल के विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिल रहा है या नहीं...
  • किसान बिजली की बढ़ी हुई दरों से बिल चुकाने में समर्थ है या नहीं...
  • बेटी के जन्म को प्रोत्साहन देने के लिए नकद राशि के प्रावधान का आम जन में सकारात्मक सन्देश जा रहा है या नहीं...
ऐसे अनेक बिंदु हैं जिन्हें जमीनी स्तर पर उस वर्ग को आंकना चाहिए था जो आज आलोचना कर रहा है और अपने स्तर पर सरकार को रिपोर्ट देनी चाहिए थी, आइना दिखाना चाइए था कि फलां  योजना की आवश्यकता है और फलां  की नहीं... वैसे भी तो शिक्षा के, स्वास्थ्य के आदि सामाजिक परस्थितियों के आधार पर व्यवस्था की कलई खोलते सर्वे हम आए दिन देखते हैं तो फिर साकारात्मक दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठा... मगर नहीं किसी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई... साथियों जिम्मेदारी महज़  कह देने भर में नहीं बल्कि उसे निभाकर कर दिखाने में है...

आज की नई पीढ़ी के पास हर तरह के आंकड़े उपलब्ध हैं, संसाधन उपलब्ध हैं, उनके पास नई सोच है... मेरा सवाल है कि आप कोई भी निर्णय लेने से पहले तुलनात्मक अध्ययन क्यूँ नई कर पाए...  क्यों यह नहीं देखा गया किसकी सरकार ने कितनी बिजली पैदा की, किसने कितने रोजगार दिए, किसने कितने स्कूल, कॉलेज, सड़कें बनाईं, और सबसे महत्वपूर्ण किसकी सरकार ने न सिर्फ आज को  बल्कि आने वाले  कल को देखते हुए दूरगामी प्रगति के लिए निर्णय लिए... 
आज का युवा कुछ खरीदने से पहले भी इंटरनेट रिव्यूज़, माउथ पब्लिसिटी,अपने ग्रुप में डिस्कसन करने के बाद भी खुद एनालिसिस  कर के नतीजे पर पहुंचता है तो फिर अपना समर्थन हमने सिर्फ बातों में आकर ही दे दिया... हम सिर्फ एक पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को देखकर, उसकी लच्छेदार बातों को सुनकर, अन्य दलों पर लांछन को सुनकर, उसके दिलचस्प अंदाज में खोकर प्रदेश स्तर की वास्तविकता को भूल गए और उस व्यक्ति विशेष के प्रभाव में आकर विकास के लिए दूरगामी सोच रखने वाली और धरातल पर रहकर बात करने वाली सरकार को और व्यक्तित्व को अनदेखा कर दिया, जबकि हम जानते हैं कि हमारे प्रदेश का नेता वह व्यक्ति विशेष नहीं उसकी पार्टी का अन्य कोई दूसरा है... इस बात को इस तरह से लें कि युवा पीढ़ी की सोच रही कि यह व्यक्ति ही सुशासन दे पाएगा और हम इसके नाम पर अपने प्रदेश में किसी को भी सत्ता सौंप रहे हैं, यह स्थिति बड़ी हास्यास्पद है यह तो ऐसा ही है कि हम किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री में अपना प्रतिनिधि देखें और उसके नाम पर किसी को भी अपना समर्थन दे दें क्योंकि दूसरा देश ज्यादा विकसित है, वह व्यक्ति आकर्षक भाषण देता है और सपने दिखाता है...

आज की पीढ़ी जानती है कि हर अर्थव्यवस्था के विकास का एक मॉडल होता है जिसका चुनाव वहाँ की स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और आवश्यकताओं को देखते हुए किया जाता है, यही बात दो प्रदेशों के आंकलन पर भी लागू होनी चाहिए अन्यथा परेडोक्स की स्थिति बन जाती है...

हमको समझना होगा, चिंतन करना होगा और देखना होगा कि हम राजनीतिक दलों को अपनी आम राय से क्या दिशा-निर्देश दे रहे हैं.  अन्यथा  विकास की बातें गौण एवं नकारात्मक हो जाएँगी और हवाई बातों की राजनीती पूरे देश पर हावी हो जाएगी जिसका खामियाजा अंततः हम सबको उठाना पडेगा...