Saturday, October 30, 2010

इंदिरा एक शक्ति.........


इंदिरा सिर्फ एक नाम ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में पहचाना जाने वाला शक्ति का एक प्रतीक है। अपने अदम्य साहस और निर्भीक छवि से भारत की इस महिला प्रधानमंत्री ने पूरी दुनिया पर एक अमिट छाप छोड़ी है....... हिन्दुस्तान को सिर्फ एक ऐसे ही साहसी व्यक्तित्व की आवश्यकता है जो अपने त्वरित निर्णयों से देश को आगे बढाने का काम कर सके।

वर्तमान परिपेक्ष्य में जिस तरह की कार्यप्रणाली उपयोग में ली जा रही है उससे देश के विकास की गति कही न कही बाधित हो रही है। निर्णय लेने की क्षमता का अभाव एवं उसके क्रियान्वयन के तरीके की वजह से आज भी वास्तविक और आधारभूत कार्यों को मूर्तरूप नहीं दिया जा पा रहा है, यही एक वजह है जिसके चलते देश आज भी लगातार कई तरह की समस्याओं.........अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, आंतरिक कलह आदि से जूझ रहा है.........

मेरा मानना है की इंदिरा जैसा व्यक्तित्व ही देश को ऐसी समस्याओं से निजात दिला सकता है, जिन्होंने, चाहे वह बांग्लादेश का मसला हो, चाहे चीन और पाकिस्तान का मसला हो या फिर देश की आंतरिक शक्ति और सुरक्षा से सम्बंधित मसला हो, इन सभी पर जिस कूटनीति और सूझबूझ से निर्णय लेकर जो काम किये उन्हें हम आज भी नहीं भुला सकते।

आज ही के दिन 31 अक्टूबर को अपना फर्ज निभाते हुए इंदिरा गांधी देश के लिए कुर्बान हो गई। महिला शक्ति के रूप में पहचानी जाने वाली इंदिरा जी की पुण्यतिथि पर हमारी सच्ची श्रद्धांजलि उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेकर ही दी जा सकती है.....

जब तक सूरज चाँद रहेगा, इंदिरा जी का नाम रहेगा........

जय हिंद......

Saturday, October 16, 2010

यूनाइटेड अगेंस्ट हंगर........


कृषिगत खाद्य उत्पादों को प्रोत्साहन देने, विकासशील देशों के मध्य आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग बढ़ाने, लोगों में वैश्विक स्तर पर भुखमरी की सामस्या के प्रति जागरूकता एवं इसके समाधान हेतु प्रयास के उद्धेश्य से, संयुक्त राष्ट के खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा, वर्ष 1981 में खाद्य सुरक्षा से जुड़े विविध पहलुओं को विषय (Theme) बनाते हुए आरम्भ किये गए विश्व खाद्य दिवस को आज विश्व भर में "United Against Hunger" Theme के साथ मनाया जा रहा है।

प्रति व्यक्ति पौष्टिक भोजन की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा, कुपोषण और भुखमरी पूरे विश्व की समस्या है। बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ कृषि भूमि पर दबाव बढ़ता जा रहा है... कृषि- भूमी का रिहायशी और औद्योगिक उपयोग भी खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बनता जा रहा है। विश्व खाद्य उत्पादन में वृहद वृद्धि और हर व्यक्ति को उसकी उपलब्धता बहुत ही मुश्किल लक्ष्य है.......... परन्तु इस दिशा में सभी देश, सरकार, समुदाय, विविध संगठनों और जनसहभागिता से किये गए सामूहिक प्रयास और सभी की सक्रीय भूमिका से ही इस गंभीर समस्या का समाधान संभव है............

International Food Policy Research Institute द्वारा जारी किये गए Global Hunger Index,2010 में हमारा देश 84 देशों में से 67वें स्थान पर रहा है रिपोर्ट के अनुसार भारत में बच्चों के पोषण और शारीरिक विकास का स्तर बेहद चिंताजनक है......

हम अपने व्यक्तिगत स्तर पर तो इसका पूर्ण समाधान तो नहीं कर सकते हैं, लेकिन यदि हम लोग प्रतिदिन कम से कम एक वास्तविक भूखे व्यक्ति को भी भोजन करा सकें तो हम इस वैश्विक प्रयास में अपना सराहनीय योगदान दे पाएंगे.....

बड़ी दुखद बात है.........

यहाँ किसी को बदहजमी से नींद ही नहीं आती और किसी को हजम करने के लिए खाना नहीं मिलता.........

Sunday, October 10, 2010

लोकतंत्र और हमारी जिम्मेदारी......


विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत, जिसके हम निवासी हैं...........। लोकतंत्र का अभिप्राय..... "जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा" शासन होता है।

साथियो जब इस देश में व्यवस्था हमारी है, हमारे लिए है और हमारे ही लोगों द्वारा बनाई गई है तब भी क्यों हम छोटी से लेकर बड़ी कमियों के लिए किसी व्यक्ति विशेष, किसी सरकार विशेष या किसी व्यवस्था विशेष पर आरोप लगाते हैं.....? अगर हम व्यवस्था में विद्यमान कार्यप्रणाली, व्यवस्थापिका और सरकार से किसी भी विषय या मुद्दे पर नाराज हैं तो क्या हमें उसका ढीढोरा पीटने के बजाय उसमें परिवर्तन और सुधार लाने के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए.....?

आज आप और हम भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा ढीढोरा पीटते हैं तो क्या उसके लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं.....?

अपनी सुविधा के लिए हम किसी की भी मांग को पूरा करने के लिए क्यों तैयार हो जाते हैं.....?

क्या हम लाइन में लगके काम नहीं करवा सकते...?

क्या हम निर्धारित नियमो के दायरे में रहकर काम नहीं कर सकते...?

क्या हम जहा सरकार भेजे वहा जाके नौकरी नहीं कर सकते....?

लेकिन नहीं, हम बस अपनी सुविधा देखते हैं और भ्रष्टाचार का रोना रोते रहते हैं.....हर समस्या का समाधान हम स्वयम हैं....इस देश के क़ानून के मुताबिक़ अपराध करने वाला और उसका साथ देने वाला दोनों बराबर के दोषी माने जाते हैं तो फिर क्यों हम दूसरे को ही दोषी कहते हैं........? रिश्वत लेना अगर अपराध है तो देने वाला भी तो अपराधी हुआ। जब इन कार्यों के लिए हम भी जिम्मेदार हैं तो क्या किसी को दोष दिया जाना उचित है.......?

मेरा मानना है की हम सबको मिलकर कमियों को गिनाने के बजाय उन्हें दूर करना चाहिए ताकि हमारी भूमिका और जिम्मेदारी का वास्तविक रूप से निर्वहन हो सके।

परिवर्तन चाहने के लिए दृढ इच्छाशक्ति का होना बहुत जरूरी है। इसके बिना हम सिर्फ बातें ही कर सकते हैं,परिवर्तन ला नहीं सकते। देश का इतिहास गवाह है की अगर चन्द लोगों ने दृढ इच्छाशक्ति से आजादी की ख्वाहिश नहीं जाहिर की होती और उसके लिए कदम न बढाए होते तो आज तक हम गुलाम भारत में रहकर यही बातें कर रहे होते की व्यवस्था खराब है,हम आजाद नहीं हैं,हम अपनी मर्जी से जी नहीं सकते इत्यादि, इत्यादि......

पाठकों यदि हम वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं और सुधार चाहते हैं तो एकजुट होकर दृढ इच्छाशक्ति से व्यक्तिगत स्वार्थों को त्यागकर मिलजुलकर एक शुरुआत करें ताकि हम अपने सपनों के भारत का निर्माण कर सकें.....

आइये कदम बढाएं......

जय हिंद......