Monday, April 5, 2010

बेहाल जनता के खुशहाल प्रतिनिधि !!!

आइये अपने जन प्रतिनिधियों को बधाई दें. यह बधाई इसलिए नहीं है की उन्होंने जनता को गरीबी, भुखमरी, असुरक्षा, से राहत दिलाने के लिए कोई सकारात्मक कार्य किया है, अरे भई यह बधाई तो उनकी पगार बढ़ने के उपलक्ष्य में है. चाहे न्यूनतम मजदूरी बढाने का मुद्दा सिर्फ मुद्दा ही रह गया हो, चाहे विधवा पेंशन के लिए 100 रूपये बढाने हेतु दसियों बार सोचना पड़ता हो. पर यह कमाल की बात है की मंत्रियों, विधायकों के वेतन-भत्तों, सुविधाओं में वृद्धि का प्रस्ताव सभी ने दलगत राजनीती से ऊपर उठकर मात्र सात मिनिट में ही पारित कर लिया. बड़ी अजीब सी बात है की अपने हित के मुद्दे पर सभी एक नजर आते हैं पर जनता के हितों पर सभी क्यों बिखर जाते हैं? वहां संयुक्त इच्छाशक्ति क्यों नहीं नजर आती?
हालाँकि कुछ दलीय विधायको ने विरोध दर्ज किया, पर विरोध के स्वर इतने बुलंद नहीं रहे जैसेकी पिछले दिनों आम जन-हितों पर बहस या चर्चा के दौरान अचानक उत्तेजनात्मक हो जाया करते हैं और जनहित की कीमत पर सदन का पूरा की पूरा दिन नेताओं की हठधार्मिता की भेंट चढ़ता रहा. पेयजल, सिंचाई, मंहगाई जैसी समस्याएँ उठाने की बजाये मारपीट और हंगामेबाजी होती नजर आती है और सदन के साथ पूरे प्रदेश की मर्यादा ताक पर रख दी जाती है. जब मन में लड्डू फुट रहे हों तो विरोध मात्र औपचारिक ही रह जाता है।
अरे भई चुनाव जीतकर आए दूसरा साल हो चला है, कब तक आम जनता का ही दुखड़ा सुनेंगे और उसके बारे में ही सोचेंगे! मान लीजिये उसकी समस्याएँ हल हो भी गई तो अगले चुनावों में मुद्दा कहाँ से लाएंगे? कितनी लुभावनी बातें कहकर जनता से वोट ऐंठे, कितना पैसा पानी की तरह बहाया, तब जाकर कुर्सी मिली है तो कुछ अपना सोचने में क्या हर्ज है! वोट के कागज़ से नोट ही तो छाप रहे हैं. रही आम जनता की समस्याएँ, तो उन पर फुर्सत में विचार होता रहेगा.
वैसे भले ही राजस्थान पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आता हो पर अपने वेतन बढाकर हमारे जनप्रतिनिधियों ने राजस्थान को तकरीबन डेढ़ दर्जन राज्यों यथा- पंजाब, गुजरात, दहली, आँध्रप्रदेश, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि से आगे कर लिया है और लगभग आधे दर्जन तो हमसे पहले से ही पीछे चल रहे थे. नए हिसाब से मिलने वाले वेतन-भत्तों में दैनिक बैठक भत्ता, कार्मिक के एवज में 20000 रूपये, रेलयात्रा , आदि समेत सभी सुविधाओं को मिला दिया जाए तो एक-एक विधायक 80000 रु. लेकर निहाल होता दिखाई दे रहा है. उल्लेखनीय है की वर्ष 2009-10 में प्रति व्यक्ति आय 3400 रूपये प्रतिमाह रही. इसके मुकाबले राजनेताओं के 80000 रु. दल-रोटी के लिए तरसती जनता के मुह पर तमाचे की तरह हैं. बढे हुए वेतन भत्ते, आधुनिक सुविधाएँ, ऐशो आराम की जिन्दगी, मुफ्त का पानी बिजली, सरकारी आवास, काम करने को सरकारी कर्मचारी, आदि का सुख भोगने वाले कथित जनप्रतिनिधियों से जनता के दुःख में भागिदार होने की उम्मीद करना बेमानी है. भरे पेट जब इंसान को अपनी भूख का ही अहसास नहीं होता तो जनता की किसे पड़ी है!
जन समस्याओं पर आवाज बुलंद करने के बजाय अपनी सुविधाओं का इंतजाम उससे खिलवाड़ है. हमारी नाक के नीचे सारा तमाशा चल रहा है और हम कुछ नहीं कर रहे हैं! इस तरह हाथ पर हाथ रखे आखिर कब तक बैठे रहेंगे? यदि आपको लगता है की मेरा कहना सही है तो आइये पहल करें, प्रयास करें, जिससे गरीब जनता के हितो को प्राथमिकता मिले. जिन्हें हम चुनकर अपने हितो का पक्ष रखने के लिए भेज रहे हैं वे वीआइपी सुविधाओं का आनंद लेकर गरीब जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं! यह अन्याय तो कतई सहनीय नहीं है.

2 comments:

  1. लोकेशजी, आप क्रांति पर उतर आये हैं.....ये तो आपको करना ही है....क्योंकि आपको इस दुनियां में यूँ ही आकर चले जाने के लिए भेजा नहीं गया है......
    आपकी पहली पोस्ट पढ़ी....लेकिन प्रतिक्रिया देने का मन नहीं हुआ....दूसरी पोस्ट पढ़ी तो लगा...कि वाकई आपने बोलना शुरू कर दिया है.....मुद्दा आपने सही उठाया...जनता की बात की...जो अक्सर लोग करना ही नहीं चाहते.
    पर मेरा मत थोडा सा अलग है.....
    जनप्रतिनिधियों को भत्ता लेने का हक़ छीना नहीं जा सकता......इस महगाई के जामने में उनके जेब में भी कुछ पैसा ज्यादा होना चाहिए...नहीं तो वो कैसे अपने घर को चलाएंगे और कैसे जनता तक पहुचेंगे!!
    हाँ इसके बदले में आप उनसे ये आशा रख सकते हैं कि वो महगाई नहीं बढ़ने देंगे....वोट का वचन निभाएंगे....गरीब के घर रोटी पहुचे...राशन की दुकान का गेहूं-चावल मोटे बनियों के गोदाम में न चला जाये.....उसके बच्चे स्कूल जाए....उनके इलाज के लिए पास में अस्पताल हो (डाक्टर और दवाई सहित).....रोजगार का कोई साधन हो..... आप उनसे आशा ही नहीं उन्होंने क्या किया इसका हिसाब मांग सकते हैं...क्योंकि आप जनप्रतिनिधियों को घर चलने के लिए तनख्वा दे रहे हैं. मुझे लगता है कि उनके बढे भत्तों पर सवाल उठाने की बजे जनप्रतिनिधियों को उत्तरदायी व जबाबदेह बनाने में जुटाना पड़ेगा....गलती तो हम ही करते हैं कि ऐसे लोगो को वोट देकर नेता बना लेते हैं जो हमसे ही जी हजुरी करवाते हैं.....सिस्टम को चलाने की जिम्मेदारी उसे देते हैं लेकिन वो उसी सिस्टम में हमको ही पीस कर रख देता है....अगली बार फिर से वोट लेकर जीत जाता है. तो कसूरवार तो हम ही हुए न!!

    ReplyDelete
  2. Well written. The bill was passed in seven minutes. That is good . But when national security is involved then this unity and attendance is not seen. That is disturbing. The elected representatives of our country do not show the same interest when it comes to the general public. Esp the vulnerable landless farmer and unorganised labourer. Then only the humble farmer Deve Gowda is remembered.Dr.Varun Kaul

    ReplyDelete