Tuesday, April 27, 2010

जीने के लिए.................

जब भी मैं यहाँ अपने विचार बाँटता हूँ आप सभी को अपने से जुडा हुआ महसूस करता हूँ. आप तो जानते हैं पहले जहा तालाब हुआ करते थे वहा दूर-दूर तक पानी का नामो-निशाँ नहीं है. रोज हम समाचारों, विज्ञापनो, अखबारों में पानी की किल्लत से दो-चार हो रहे हैं. पर क्या वाकई इन सबका हम पर गहरा असर होता है? ऐसा नहीं है की हम समस्या को अनदेखा कर देते हैं, हम खबर को बाकायदा पढ़ते हैं, सुनते हैं, उस पर चिंता भी व्यक्त करते हैं!!!! फिर वही धाक के तीन पात, फिर रोजमर्रा के कामकाज में लग जाते हैं.....! हो सकता है आपमें से अधिकतर पानी की समस्या से नहीं गुजर रहे हों, आपको अपनी आवश्यकतानुसार पानी आराम से उपलब्ध हो. जब आसानी से कोई चीज मिल रही है तो उसकी कद्र कौन करे.....? ये तो जग जाहिर है, जाके पैर न फटे बिवाई सो का जाने पीर पराई.... पानी को व्यर्थ बहाना शहरी क्षेत्र में ही ज्यादा देखने को मिलेगा, गावो, बस्तियों, और दूर-दराज के इलाकों में आप जाके देखो पानी को काफी सोच-समझ के इस्तेमाल किया जाता है, जाहिर सी बात है होगा भी, उन्हें उसके लिए मशक्कत जो करनी पड़ती है.

मैं यहाँ यह बिलकुल नहीं कह रहा हूँ की एक-दो बाल्टी पानी रोज बचाओ, या आप अपनी जरुरी आवश्यकताओं पर पानी के खर्च में कटौती करो, ऐसी बाते बेवजह के तर्क हैं. मैं तो बस आपसे तीन बाते कहना चाहता हूँ............

एक-- तो हम पानी को बर्बाद न करें भले ही हमारे पास बेतहाशा उपलब्ध है, क्योकि हो सकता है कल न हो।

दूसरी बात-- हम घर में रोजमर्रा की जरुरतो में काफी पानी उपयोग में लाते हैं मसलन- बर्तन, कपडे, नहाने-धोने में, ये पानी बस एक बार उपयोग में आके हमेशा के लिए प्रदूषित हो जाता है. हम इस पानी को रिसाइकिल कर के पीने के अलावा सामान्य जरुरतो में काम में ले सकते हैं, बस थोडा सा ध्यान देने की जरुरत है, हमारे घर का पानी हमारे बार-बार काम आता रहेगा फिर न तो हमें भटकना पड़ेगा और न ही धरती का सीना छलनी करना पड़ेगा।

तीसरी बात है-- बारिश के पानी की, आपको पता है प्रकृति हर जगह जल बरसाती है, गावो , दूर-दराज के हिस्सों में तो वो रिस-रिसके जमीन में चला जाता है पर शहरी इलाकों में सब बर्बाद हो जाता है. हम थोड़ी सी जागरुकता दिखा कर इसे बर्बाद होने से बचा सकते हैं और अपनी धरती और इस पर रहने वाले सभी जीवो का कल सुरक्षित कर सकते हैं. यहाँ एक बात अपने मन से निकाल दीजिये -की मैं ऐसा क्यों करू?, मेरी जरुरत तो पूरी हो रही है न, नहीं ये गलत है। आप बताइये कितना दुखद मंजर होगा वो जब हमारी धरती पर लोग पानी के लिए मर रहे होंगे ......! कुछ लोग सोचते हैं वो दिन अभी काफी दूर है तो ये बताइये आग लगे पर कुआ खोदना कोई समझदारी है? नहीं ........, तो आज से ही तैयारी क्यूँ न की जाए हम सभी के भीतर एक विवेकशील मस्तिष्क है, आज की सामान्य समस्या को हम कल भयावह होने से रोक सकते हैं।

कुदरत का बेशकीमती वरदान है जल, इसे सहेजिये, एक बार कर के देखिये, तो आप पाएंगे अपने घर में प्रकृति की देन का यह भंडार आपके मन को आपके बैंक बैलेंस से भी ज्यादा सुकून देगा......... मानवधर्म निभाइए और अपने, अपने परिवार, आस-पड़ोस एवं समाज सभी के लिए मिसाल कायम कीजिये, फिर देखिये आपकी एक छोटी सी कोशिश कैसे रंग लाती है।

अंत में बस आपसे ये कहना चाहता हूँ पानी नहीं बचा तो कुछ नहीं बचेगा और अपने अंत की रुपरेखा तो हम तैयार नहीं सकते हैना? ये धरती हमारी है, ये हमें जीवन देती है तो इसकी सुरक्षा भी तो हमें ही करनी है और इसकी अनमोल देन- जल को सहेज कर सच मानिए हम अपना ही भला करने जा रहे हैं न की किसी पर अहसान....

Sunday, April 11, 2010

इंडियन प्रीमियर लीग: कहाँ है इंडिया?...

देश में चल रहे आईपीएल के बुखार में आप भी बुरी तरह जकड़े होंगे। हो सकता है आप इस भीड़ में शामिल न हों, पर इस आईपीएल ने देश के युवाओं की जो हालत की है वो तो जग जाहिर है। मैं यहाँ खेल की बुराई कतई नहीं कर रहा हूँ पर में तो खेल के तरीके से व्यथित हूँ. हम कहाँ जा रहे हैं, किस चीज का हिस्सा बन रहे हैं, खुद हमें नहीं मालूम. हम बस उस तरह की प्रतियोगिता को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमे सबकुछ पैसे के लिए होता है, जिसमे देश के चंद सौदागरों ने खेल को खरीद लिया है। मन में एक टीस सी उठती है की, बिकने के लिए तो देश में पहले ही काफी कुछ है, कम से कम खेल और खेल की भावना को तो बख्श देते। पर इस से भी दुःख की बात यह है की ये सब खुलेआम बड़े आराम से चल रहा है और सब राजी-राजी इसका आनंद ले रहे हैं। ऐसे ही आँखे मूंदे बैठे रहे तो ऊपरवाला ही जाने आगे इस खेल में और कितने खेल देखने को मिलेंगे!

आईपीएल के नाम से खिलाडियों की बोली लगी ,जिनका क्रिकेट से कोई सरोकार नहीं है उन्होंने मोटी रकम हाथ में लिए खिलाडियों की कीमत तय कर ली। जिन्हें देश का बच्चा-बच्चा अपना रोल मॉडल मानता है वो सरेआम बिक गए ! कभी सोचा है, इस नाटक में शामिल लोगो ने इस तरह खेल और खिलाडियों की बोली लगने का देश के बच्चो में क्या सन्देश जाता होगा? देखिये तो सही खरीददारों ने अपनी-अपनी जेब के हिसाब से देशी विदेशी खिलाडियों को मिला-मिलूकर भानुमती के कुनबे सरीखी टीमे तैयार करली और बाजार में टिकने के लिए आकर्षक नाम दे दिए और हो गया तमाशा शुरू. आयोजक धन की बारिश कर रहे हैं और सब के सब पैसे के लिए खेल रहे हैं। आज यह खेल फ़टाफ़ट नाम और पैसा कमाने का साधन बनता जा रहा है। तभी तो राजनेता भी खेल के अखाड़े में उतर आए हैं, जिनका क्रिकेट से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था! कोरपोरेट घराने, खिलाडी, राजनेता सभी के हित देश से ऊपर होते दिखाई दे रहे हैं. सब मिल बांटकर बटोर रहे हैं और लुट रहे हैं हम, तार-तार हो रही है देश की खेल संवेदनाएं।

हमारे देश के अन्दर जब पहले से ही राज्यों की टीमे मौजूद हैं तो नई टीम गठित करना और इसके लिए बाहरी खिलाडियों की जरुरत तो बिलकुल समझ में नहीं आती। हमारे देश में भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। राज्यों में अपने क्रिकेट बोर्ड हैं, अपनी टीमे है। कितना अच्छा होता की बिना इस आईपीएल के दिखावे के अपने ही राज्यों की टीमो के बीच सुखद प्रतिस्पर्धा होती. हर राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व हमारी अंतर्राष्ट्रीय टीम के खिलाडी करते। हा थोड़ी कमाई कम होती पर सच मानिए इस से देश की युवा प्रतिभाएं उभर कर आती, उन्हें निखरने का मौका मिलता जो बस आज एक मौके की आस में इन सौदागरों का मूंह ताकती रहती हैं। इस तरह हमारे खिलाडियो के खेल का स्तर बढ़ता और आने वाले विश्वकप में सर्वश्रेष्ठ खिलाडी भारत का प्रतिनिधित्व करते और हमारी दावेदारी मजबूत होती। बड़े दुःख की बात है आज देश की प्रतिभाओं का देश में ही खेलना दूभर हो गया है, अंतर्राष्ट्रिय टीम में चयन तो दूर की बात है और कडवी सच्चाई ये है की ये सब अपनों का ही किया धरा है।

क्रिकेट में धन की बारिश हो रही है चंद देशी-विदेशी खिलाडी, धनी आयोजक और घराने साथ मिलकर नाम, पैसा, शोहरत के मालिक बने बैठे हैं। शीर्ष पर बैठे इन लोगो के दोनों हाथ घी में और सर कढाई में हैं वही दूसरे खेल और खिलाड़ी ख़ाक छान रहे हैं, हमारा राष्ट्रीय खेल गुमनामी के अँधेरे में डूबता जा रहा है. हॉकी की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है, यही हाल कमोबेश अधिकतर खेलो का है। शाहरुख हॉकी पर फिल्म बनाते हैं, नाम, पैसा, स्टारडम, सहानुभूति, और खूब वाहवाही लूटते हैं पर वास्तविकता में क्रिकेट के साथ हो लेते हैं। हमारे पडोसी देश के खिलाडियों को आईपीएल में शामिल न किये जाने के दर्द का अहसास उन्हें है, पर जिस खेल पर उन्होंने पूरी फिल्म बना डाली उसकी गिरती दशा पर कोई प्रतिक्रया नहीं! उल्लेखनीय है की हमारे देश में दर्शक परदे पर दिग्गज अभिनेताओं की प्रस्तुति को काफी गंभीरता से लेते हैं और अभिनेता को उसके साथ जोड़कर देखते हैं। पर उगते सूरज को सलाम तो दुनिया का दस्तूर है और ऐसा करने वाले अकेले शाहरुख ही तो नहीं हैं।

सब से जादा तो मैं मीडिया के खिलाफ हूँ। कहने भर को लोकतंत्र का तीसरा स्तम्भ है पर देश की वास्तविक समस्याओं से पल्ला झाड रखा है। इन्हें बस लम्बी चलने वाली मिर्च मसालेदार खबर चाहिए। टीआरपी बटोरने के लिए बेतुके मुद्दों को तूल देना जगजाहिर है। वैसे तो आपके साथ खुलकर इस दर्द को बाँटना चाहता हूँ पर अभी बात क्रिकेट के बारे में ही करते हैं. मिडिया हमेशा क्रिकेट खिलाड़ियों को सुर्ख़ियों में रखता है। आप सवेरे देश-दुनिया की ख़बरों के लिए टीवी चालु कीजिये आपको मुख्य खबर सुनाई देगी--- आखिर क्या है धोनी का पहला प्यार???, कही कोई क्रिकेटर हसीनाओं के साथ कमर में हाथ डाले थिरकता नजर आएगा तो किसी के अफेयर का ताजा-तरीन मामला देख आप अपना सर पीट लेंगे।

हमारी तो पूरी व्यवस्था में ही खोट है। खेल मंत्रालय कहने भर को ही है। खेल संघो, गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए अनेक कानून बने पर कागजों में ही रह गए। देश के युवा भी क्रिकेट की अन्धेर्गिर्दी और दूसरे खेलो की बेकद्री में दोषी हैं, ये बस भीड़ में शामिल होना जानते हैं और खेल भी इन के लिए मनोरंजन के माध्यम से ज्यादा कुछ नहीं है। ये अपनी रोजमर्रा की जरूरतों से इतर कुछ नहीं सोचते. यहाँ कुछ पंक्तिया याद आती हैं......



बर्बाद गुलिस्ता करने को बस एक ही उल्लू काफी है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ता क्या होगा??

ऊपर जो भी आपने पढ़ा उसे पढ़कर आपको मेरे दुःख का अहसास हो गया होगा। क्या आप और हम मिलकर खेल और खेल के स्तर में कुछ सुधार नहीं कर सकते?...............

Monday, April 5, 2010

बेहाल जनता के खुशहाल प्रतिनिधि !!!

आइये अपने जन प्रतिनिधियों को बधाई दें. यह बधाई इसलिए नहीं है की उन्होंने जनता को गरीबी, भुखमरी, असुरक्षा, से राहत दिलाने के लिए कोई सकारात्मक कार्य किया है, अरे भई यह बधाई तो उनकी पगार बढ़ने के उपलक्ष्य में है. चाहे न्यूनतम मजदूरी बढाने का मुद्दा सिर्फ मुद्दा ही रह गया हो, चाहे विधवा पेंशन के लिए 100 रूपये बढाने हेतु दसियों बार सोचना पड़ता हो. पर यह कमाल की बात है की मंत्रियों, विधायकों के वेतन-भत्तों, सुविधाओं में वृद्धि का प्रस्ताव सभी ने दलगत राजनीती से ऊपर उठकर मात्र सात मिनिट में ही पारित कर लिया. बड़ी अजीब सी बात है की अपने हित के मुद्दे पर सभी एक नजर आते हैं पर जनता के हितों पर सभी क्यों बिखर जाते हैं? वहां संयुक्त इच्छाशक्ति क्यों नहीं नजर आती?
हालाँकि कुछ दलीय विधायको ने विरोध दर्ज किया, पर विरोध के स्वर इतने बुलंद नहीं रहे जैसेकी पिछले दिनों आम जन-हितों पर बहस या चर्चा के दौरान अचानक उत्तेजनात्मक हो जाया करते हैं और जनहित की कीमत पर सदन का पूरा की पूरा दिन नेताओं की हठधार्मिता की भेंट चढ़ता रहा. पेयजल, सिंचाई, मंहगाई जैसी समस्याएँ उठाने की बजाये मारपीट और हंगामेबाजी होती नजर आती है और सदन के साथ पूरे प्रदेश की मर्यादा ताक पर रख दी जाती है. जब मन में लड्डू फुट रहे हों तो विरोध मात्र औपचारिक ही रह जाता है।
अरे भई चुनाव जीतकर आए दूसरा साल हो चला है, कब तक आम जनता का ही दुखड़ा सुनेंगे और उसके बारे में ही सोचेंगे! मान लीजिये उसकी समस्याएँ हल हो भी गई तो अगले चुनावों में मुद्दा कहाँ से लाएंगे? कितनी लुभावनी बातें कहकर जनता से वोट ऐंठे, कितना पैसा पानी की तरह बहाया, तब जाकर कुर्सी मिली है तो कुछ अपना सोचने में क्या हर्ज है! वोट के कागज़ से नोट ही तो छाप रहे हैं. रही आम जनता की समस्याएँ, तो उन पर फुर्सत में विचार होता रहेगा.
वैसे भले ही राजस्थान पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आता हो पर अपने वेतन बढाकर हमारे जनप्रतिनिधियों ने राजस्थान को तकरीबन डेढ़ दर्जन राज्यों यथा- पंजाब, गुजरात, दहली, आँध्रप्रदेश, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि से आगे कर लिया है और लगभग आधे दर्जन तो हमसे पहले से ही पीछे चल रहे थे. नए हिसाब से मिलने वाले वेतन-भत्तों में दैनिक बैठक भत्ता, कार्मिक के एवज में 20000 रूपये, रेलयात्रा , आदि समेत सभी सुविधाओं को मिला दिया जाए तो एक-एक विधायक 80000 रु. लेकर निहाल होता दिखाई दे रहा है. उल्लेखनीय है की वर्ष 2009-10 में प्रति व्यक्ति आय 3400 रूपये प्रतिमाह रही. इसके मुकाबले राजनेताओं के 80000 रु. दल-रोटी के लिए तरसती जनता के मुह पर तमाचे की तरह हैं. बढे हुए वेतन भत्ते, आधुनिक सुविधाएँ, ऐशो आराम की जिन्दगी, मुफ्त का पानी बिजली, सरकारी आवास, काम करने को सरकारी कर्मचारी, आदि का सुख भोगने वाले कथित जनप्रतिनिधियों से जनता के दुःख में भागिदार होने की उम्मीद करना बेमानी है. भरे पेट जब इंसान को अपनी भूख का ही अहसास नहीं होता तो जनता की किसे पड़ी है!
जन समस्याओं पर आवाज बुलंद करने के बजाय अपनी सुविधाओं का इंतजाम उससे खिलवाड़ है. हमारी नाक के नीचे सारा तमाशा चल रहा है और हम कुछ नहीं कर रहे हैं! इस तरह हाथ पर हाथ रखे आखिर कब तक बैठे रहेंगे? यदि आपको लगता है की मेरा कहना सही है तो आइये पहल करें, प्रयास करें, जिससे गरीब जनता के हितो को प्राथमिकता मिले. जिन्हें हम चुनकर अपने हितो का पक्ष रखने के लिए भेज रहे हैं वे वीआइपी सुविधाओं का आनंद लेकर गरीब जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं! यह अन्याय तो कतई सहनीय नहीं है.