Tuesday, March 30, 2010

विकास की धुंधली तस्वीर

आए दिन भारत के विकास की स्वर्णिम प्रतिमा दिखलाते आंकड़े तथा वक्तव्य सुनने और देखने को मिल जाते हैं। कहने को हमारी विकास दर बुलंदियों पर पहुँच रही है, भारत की आर्थिक वृद्धि दर के चालू वित्तीय वर्ष में 7.2% रहने के अनुमान हैं, इस मामले में चीन हम से आगे है और कहा जा रहा है की अगले चार वर्षो में हम चीन को भी पीछे छोड़ देंगे। यह 7.2% आर्थिक विकास की दर हम तब प्राप्त कर रहे हैं जबकि विश्व की मुख्य अर्थव्यवस्थाएं (भारत भी), भयावह आर्थिक मंदी के दुश्चक्र से गुजर रही थी। इन विपरीत परिस्थितियों में हमने विश्व की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ दिया यथा अमरीका 5.7% , जापान 4.8%, इंग्लेंड 0.1%, जर्मनी 0.7%, इटली 0.2% तथा रूस -8.9% के साथ हमसे पिछड़े। मजबूती से टिकी रही भारतीय अर्थव्यवस्था की भावी वर्षों - 2010-11 के लिए 8.5% एवं 11-12 के लिए 9% आर्थिक वृद्धि दर अनुमानित है। सामीक्षात्मक रूप से अर्थव्यवस्था में सकारात्मक सुधार के संकेत हैं।

आइये उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था के दुसरे पहलुओं पर भी गौर करते हैं। भारत में मुद्रास्फीति लगातार बढ़ रही है, जो की एशिया में सर्वाधिक है, कोई भी राष्ट्र यहाँ तक की दुनिया का सबसे धनाढ्य देश भी खाद्य पदार्थो की 18 फीसदी वृद्धि दर के साथ आगे नहीं बढ़ सकता।

आंकड़े बताते हैं की मंदी के बावजूद पिछले छः वर्षो में भारतीय शेयर बाजार 199.1 फीसदी चढ़ा, चालू वित्तीय वर्ष के दौरान हमारी प्रति व्यक्ति आय में 6.5 फीसदी बढ़त दर्ज की गई। यहाँ सवाल यह उठता है की भारत का 40 फीसदी गरीब जो तमाम प्रयासों के बावजूद दो वक्त के खाने का इंतजाम नहीं कर पाता है (और इनमे से अधिकांश भूखे सोने को विवश हैं), वह शेयर बाजार में क्या निवेश करता होगा? और उक्त आय की वृद्धि में क्या उसकी आय भी शामिल है? एक तरफ सरकारी कर्मचारियों पर छठे वेतन आयोग तथा हाल ही में मंहगाई भत्ते की बढ़ोतरी से विकास की रुपरेखा खींची जा रही है तो दूसरी और महानरेगा में कार्यरत जनता को न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम भुगतान का प्रावधान है और इसमें भी हैरत की कोई बात नहीं है की ये 100 रु भी आम जनता को नहीं मिलते हें। सर्वविदित हे, कलेक्टर से लेकर सरपंच तक सभी गरीब जनता के हक़ पर कुंडली मारे बेठे हें। जब पूरे कुए में ही भांग पड़ी हो तो उम्मीद भी क्या की जा सकती है?

भयावह मंदी के चलते छोटी-छोटी बचतों और सशक्त आंतरिक व्यवस्था के सहारे भारतीय अर्थव्यवस्था अन्य देशो की तुलना में मजबूती से टिकी रही। निम्न आय वर्ग की छोटी बचतें तथा छोटे निवेश हमारी अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। जैसे-जैसे इस वर्ग की आय बढती है, यह अपनी मूलभूत आवश्यकताओ से इतर आवश्यकताओ पर व्यय करता है। परन्तु बढती मंहगाई और निम्न आय वाले नौकरी पेशा वर्ग पर कड़े कर प्रावधानों ने इस वर्ग की कमर तोड़ दी है। दूसरी तरफ बड़े उद्यमी एवं व्यवसायी अपनी आय में भारी हेर-फेर कर लेते हैं, तमाम ऐसी राहें निकल लेते हैं जिनसे बढ़ी हुई आय को घटाकर दिखाया जा सके और इस तरह कर चोरी करते हैं। इनके पास अपने काले धन को ठिकाने लगाने के अनेक विकल्प मौजूद हैं। देश के सतत विकास हेतु होना यह चाहिए की दुसरे वर्ग पर लगाम कसते हुए निम्न आय वर्ग को कर प्रावधानों में रियायत दी जाए जिससे उनकी क्रय-शक्ति बढे तथा अर्थव्यवस्था में बचत तथा निवेश फले-फुले।

बढती मुद्रास्फीति गरीब तथा मध्यमवर्गीय लोगो को सर्वप्रथम अपने चंगुल में लेती है। ये ऐसे वर्ग हैं जो कभी अपने लिए भारी धन्माया नहीं जोड़ पाते और दो जून की रोटी के जुगाड़ में इनकी जिन्दगी गुजर जाती है। राजनीतिक प्रतिनिधि जिन्हें आम जनता यह सोचकर चुनावो में जीतती है की वे बाद में उनके हित में कार्य करेंगे, चुनाव जीतते ही आम से खास हो जाते हें। इतने विलम्ब के बावजूद भी बढती मंहगाई से निजात पाने के लिए संयुक्त इच्छाशक्ति नहीं नजर आ रही है। कोई मंहगाई पर चार लुभावनी बाते कहकर सत्तापक्ष की खिंचाई और वाहवाही लूटकर अपना वोट बैंक बढाने की फ़िराक में है तो कोई सार्वजानिक रूप से लाखो के नोटों की माला पहनकर न सिर्फ लोकतंत्र का मजाक बना रहा है बल्कि भूखी जनता के सामने सुख और वैभव का प्रदर्शन कर जनहितकारी बनने की हास्यास्पद कोशिश भी कर रहा है। दिलचस्प बात यह है की जानलेवा मंहगाई के इस दौर में तिल-तिल मरती जनता को समस्या के समाधान के बजाये गैरजिम्मेदार बयानबाजी सुनने को मिलती है जिससे उसकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर जाता है। सरकार जरुरी चीजो के दाम कम करने के लिए जो भी उपाय करती है उनकी जानकारी बाजार में पहले से ही हो जाती है इससे जमाखोरी बढती है जो कालाबाजारी को जन्म देती है. बिचोलियों एवं जमाखोरों की पौबारह हो रही है और आम जनता आभाव से ग्रस्त है।

पिछले वर्षो में डॉलर के मुकाबले रूपये के अवमूल्यन से हमारे आयात मंहगे हो रहे हैं। जनसंखया वृद्धि के मुताबिक खाद्यानो का उत्पादन न होने से हमारे आयात बढ़ रहे हैं। हम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में वस्तुओ की अधिक कीमतें चुकाने को बाध्य हैं। इससे आम जनता को भी वस्तुए मंहगी मिल रही हैं। सरकार आवश्यक वस्तुओ पर टैक्स कम रखकर लोगों को राहत दे सकती है।
यहाँ अपने विचारो को आपके साथ रखकर मैं इस समस्या की तरफ आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ. आइये इस मुद्दे पर बाते करे, समस्या पर सोचे और समाधान तलाशें. अर्थात मंहगाई की समस्या पर संयुक्तइच्छाशक्ति के साथ सोचने और समाधान जुटाने की जरुरत है नहीं तो यह देश के विकास की गति को लील जाएगी।