Friday, December 24, 2010

आदमी व्यवहार में आदिम ही दिखता है अभी, यूँ तो है दुनिया सभी आदिम प्रथाओं के ख़िलाफ़...



राजस्थान पिछले तीन दिनों से गुर्जर आन्दोलन की आग में धधक रहा है। प्रदेशवासी डरे और सहमे हुए से हैं कि अब क्या होगा........? उनके जहन में पिछले आन्दोलन की याद ताज़ा हो जाती है, जिसमें कि गोलियां चल गई थीं और लगभग दो दर्जन युवक हताहत भी हो गए थे साथ ही भारी मात्रा में सरकारी और निजी संपत्ति का क्षय हुआ था..........

आन्दोलन करना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और अपनी मांगें मनवाने का एक तरीका है, लेकिन आन्दोलन करने के साथ-साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आन्दोलन से आम जन प्रभावित न हो और उद्धेश्यपूर्ति हेतु जिस भी व्यवस्था का ध्यान आकृष्ट करना है, चाहे वो व्यवस्थापिका हो, कार्यपालिका हो या फिर न्यायपालिका हो, वहीं तक सीमित रहे।

बड़े दुःख की बात है कि अपनी मांगे मनवाने के लिए हमारे साथी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि रेलवे ट्रेक रोकने से, राष्ट्रीय राजमार्गों को रोकने से, बाजारों को बंद करवाने से और स्कूलों, चिकित्सालयों आदि सरकारी संस्थानों को बंद करवाने से कोई फलदायक नतीजा नहीं आएगा, बल्कि आम जन में जाति विशेष के लिए रोष उत्पन्न हो जाएगा............... आन्दोलनकारियों को यह सोचना चाहिए कि ऐसा सब करने से आम जनता कितनी ज्यादा प्रभावित हो रही है.........! अपना नियमित जीवन भी नहीं जी पा रही है और ये स्वयं भी उसी समाज का हिस्सा हैं, जिसमें बाकी के लोग भी रहते हैं, कहीं ऐसा न हो की आने वाले भविष्य में समाज के अन्य वर्ग इनके साथ सामाजिक सामंजस्य नहीं बिठा पाएं..............!

आन्दोलनकारियों और नेतृत्वकर्ताओं से आम जन यह जानना चाहता है कि........

रेलवे ट्रेक रोकना कहाँ तक उचित है........?
राजमार्गों को रोकना कहाँ तक उचित है.......?
आवागमन के और यातायात के साधनों को रोकना कहाँ तक उचित है.......?
सरकारी संपत्ति, जो कि हमारे ही पैसे से बनी है को नुकसान पहुचाना कहाँ तक उचित है........?
आम आदमी की दिनचर्या को रोक देना कहाँ तक उचित है........?
युवा छात्र-छात्राएं, जो कि दिन-रात मेहनत करके भविष्य निर्माण में लगे हुए है, उनका इस वजह से परीक्षाएं नहीं दे पाना कहाँ तक उचित है.........?


ऐसे और भी बहुत सारे सवाल हैं, जिनका जवाब आम जनता चाहती है और कहती है कि आप भी तो हमारे ही साथी हो........!

मेरी आन्दोलनकारी और नेतृत्वकर्ताओं से करबद्ध गुजारिश है कि हम समाज के बाकी सभी लोग उनके साथी हैं और चाहते हैं कि उनकी जायज मांग पूरी हो, जिसे कि क़ानून और सरकार मान्यता दे किन्तु हमें होने वाली परेशानियों का भी ध्यान रखा जाए......

जय हिंद.....
जय भारत.....




Sunday, December 5, 2010

फिजूलखर्ची...... या रोजीरोटी........




इन दिनों शादियों का सीजन जोरों पर है साथ ही इससे जुड़े तमाम प्रकार के व्यवसाय और व्यवसायियों की आजकल पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कढाई में है।

देखा जाए तो जहां एक तरफ शादी समारोह में होने वाले खर्च की राशि करोड़ों और अरबों को छू रही है वहीँ दूसरी तरफ एक पूरे का पूरा तबका भूखे पेट सोने को मजबूर है।

मैं एक साधारण नागरिक की हैसियत से अगर सब से यह प्रश्न करू की क्या ये सब उचित है......? विवाह समारोह में होने वाला बेहिसाब खर्चा, क्या सिर्फ दिखावा मात्र नहीं है.......? क्या यह सिर्फ अपने status और एक वर्ग विशेष को बनाए रखने का रूप नहीं है........?

दोस्तों आपका मन भी शायद यही कह रहा होगा की वास्तव में कहीं न कहीं धन की बर्बादी हो रही है, लेकिन मैं यहाँ यह नहीं कहूँगा की ये सब बंद हो जाना चाहिए, मेरी सोच कुछ जरा हटके है.......।

मुझे लगता है की इसी बहाने ही सही धन्ना सेठों की तिजोरियों में रखा हुआ पैसा बाहर आकर कितनों को रोजगार और रोटी देता है....... कही न कही, किसी न किसी रूप में इन तमाम व्यवसायों से जुड़े हुए मजदूरों को काम देता है। भला हो ऐसे कुबेरों का, जिन्हें अपने कमाए हुए धन का हिसाब तक पता नहीं है, क्योंकि ऐसे तमाम लोग प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से तो परोपकार का काम कर ही रहे हैं.......!

सोच कर देखें की यदि ऐसा बंद हो जाए या सभी सादगी पूर्वक समारोह आदि करने लग जाएं तो इसमें खर्च होने वाला पूरा धन ज्यों का त्यों उनकी तिजोरी या बेंक में पड़ा रहेगा और अर्थव्यवस्था की निरंतरता में बाधक बन जाएगा.......... मेरा मानना है की हममें से शायद ही कोई परोपकार के नाम पर सीधे तौर पर कभी किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था को कोई धन राशि उपलब्ध करवाता होगा। चलो ऐसे ही सही दिखावे और वर्ग विशेष की पहचान को बनाए रखने के लिए ही सही हमें ऐसा करते रहना चाहिए और इस तरह के आयोजनों में पूरे उत्साह के साथ शामिल होना चाहिए, ताकि हम भी इस पुन्य के काम में भागीदार बन सकें........

जहां तक मुझे लगता है इस पूरी प्रक्रिया में कही न कही स्थानीय प्रशासन को भी प्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभानी चाहिए और एक निश्चित राशि से ऊपर होने वाले खर्च पर एक अति न्यूनतम चार्ज सामाजिक कल्याण कर के रूप में आयोजक से वसूल किया जाना चाहिए, क्योंकि ये मामूली राशि आयोजक के लिए तो भारी नहीं होगी लेकिन इससे सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए राशि एकत्रित हो सकेगी और सीधे तौर पर जरूरतमंद के काम आ सकेगी........

Saturday, October 30, 2010

इंदिरा एक शक्ति.........


इंदिरा सिर्फ एक नाम ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में पहचाना जाने वाला शक्ति का एक प्रतीक है। अपने अदम्य साहस और निर्भीक छवि से भारत की इस महिला प्रधानमंत्री ने पूरी दुनिया पर एक अमिट छाप छोड़ी है....... हिन्दुस्तान को सिर्फ एक ऐसे ही साहसी व्यक्तित्व की आवश्यकता है जो अपने त्वरित निर्णयों से देश को आगे बढाने का काम कर सके।

वर्तमान परिपेक्ष्य में जिस तरह की कार्यप्रणाली उपयोग में ली जा रही है उससे देश के विकास की गति कही न कही बाधित हो रही है। निर्णय लेने की क्षमता का अभाव एवं उसके क्रियान्वयन के तरीके की वजह से आज भी वास्तविक और आधारभूत कार्यों को मूर्तरूप नहीं दिया जा पा रहा है, यही एक वजह है जिसके चलते देश आज भी लगातार कई तरह की समस्याओं.........अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, आंतरिक कलह आदि से जूझ रहा है.........

मेरा मानना है की इंदिरा जैसा व्यक्तित्व ही देश को ऐसी समस्याओं से निजात दिला सकता है, जिन्होंने, चाहे वह बांग्लादेश का मसला हो, चाहे चीन और पाकिस्तान का मसला हो या फिर देश की आंतरिक शक्ति और सुरक्षा से सम्बंधित मसला हो, इन सभी पर जिस कूटनीति और सूझबूझ से निर्णय लेकर जो काम किये उन्हें हम आज भी नहीं भुला सकते।

आज ही के दिन 31 अक्टूबर को अपना फर्ज निभाते हुए इंदिरा गांधी देश के लिए कुर्बान हो गई। महिला शक्ति के रूप में पहचानी जाने वाली इंदिरा जी की पुण्यतिथि पर हमारी सच्ची श्रद्धांजलि उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेकर ही दी जा सकती है.....

जब तक सूरज चाँद रहेगा, इंदिरा जी का नाम रहेगा........

जय हिंद......

Saturday, October 16, 2010

यूनाइटेड अगेंस्ट हंगर........


कृषिगत खाद्य उत्पादों को प्रोत्साहन देने, विकासशील देशों के मध्य आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग बढ़ाने, लोगों में वैश्विक स्तर पर भुखमरी की सामस्या के प्रति जागरूकता एवं इसके समाधान हेतु प्रयास के उद्धेश्य से, संयुक्त राष्ट के खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा, वर्ष 1981 में खाद्य सुरक्षा से जुड़े विविध पहलुओं को विषय (Theme) बनाते हुए आरम्भ किये गए विश्व खाद्य दिवस को आज विश्व भर में "United Against Hunger" Theme के साथ मनाया जा रहा है।

प्रति व्यक्ति पौष्टिक भोजन की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा, कुपोषण और भुखमरी पूरे विश्व की समस्या है। बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ कृषि भूमि पर दबाव बढ़ता जा रहा है... कृषि- भूमी का रिहायशी और औद्योगिक उपयोग भी खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बनता जा रहा है। विश्व खाद्य उत्पादन में वृहद वृद्धि और हर व्यक्ति को उसकी उपलब्धता बहुत ही मुश्किल लक्ष्य है.......... परन्तु इस दिशा में सभी देश, सरकार, समुदाय, विविध संगठनों और जनसहभागिता से किये गए सामूहिक प्रयास और सभी की सक्रीय भूमिका से ही इस गंभीर समस्या का समाधान संभव है............

International Food Policy Research Institute द्वारा जारी किये गए Global Hunger Index,2010 में हमारा देश 84 देशों में से 67वें स्थान पर रहा है रिपोर्ट के अनुसार भारत में बच्चों के पोषण और शारीरिक विकास का स्तर बेहद चिंताजनक है......

हम अपने व्यक्तिगत स्तर पर तो इसका पूर्ण समाधान तो नहीं कर सकते हैं, लेकिन यदि हम लोग प्रतिदिन कम से कम एक वास्तविक भूखे व्यक्ति को भी भोजन करा सकें तो हम इस वैश्विक प्रयास में अपना सराहनीय योगदान दे पाएंगे.....

बड़ी दुखद बात है.........

यहाँ किसी को बदहजमी से नींद ही नहीं आती और किसी को हजम करने के लिए खाना नहीं मिलता.........

Sunday, October 10, 2010

लोकतंत्र और हमारी जिम्मेदारी......


विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत, जिसके हम निवासी हैं...........। लोकतंत्र का अभिप्राय..... "जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा" शासन होता है।

साथियो जब इस देश में व्यवस्था हमारी है, हमारे लिए है और हमारे ही लोगों द्वारा बनाई गई है तब भी क्यों हम छोटी से लेकर बड़ी कमियों के लिए किसी व्यक्ति विशेष, किसी सरकार विशेष या किसी व्यवस्था विशेष पर आरोप लगाते हैं.....? अगर हम व्यवस्था में विद्यमान कार्यप्रणाली, व्यवस्थापिका और सरकार से किसी भी विषय या मुद्दे पर नाराज हैं तो क्या हमें उसका ढीढोरा पीटने के बजाय उसमें परिवर्तन और सुधार लाने के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए.....?

आज आप और हम भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा ढीढोरा पीटते हैं तो क्या उसके लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं.....?

अपनी सुविधा के लिए हम किसी की भी मांग को पूरा करने के लिए क्यों तैयार हो जाते हैं.....?

क्या हम लाइन में लगके काम नहीं करवा सकते...?

क्या हम निर्धारित नियमो के दायरे में रहकर काम नहीं कर सकते...?

क्या हम जहा सरकार भेजे वहा जाके नौकरी नहीं कर सकते....?

लेकिन नहीं, हम बस अपनी सुविधा देखते हैं और भ्रष्टाचार का रोना रोते रहते हैं.....हर समस्या का समाधान हम स्वयम हैं....इस देश के क़ानून के मुताबिक़ अपराध करने वाला और उसका साथ देने वाला दोनों बराबर के दोषी माने जाते हैं तो फिर क्यों हम दूसरे को ही दोषी कहते हैं........? रिश्वत लेना अगर अपराध है तो देने वाला भी तो अपराधी हुआ। जब इन कार्यों के लिए हम भी जिम्मेदार हैं तो क्या किसी को दोष दिया जाना उचित है.......?

मेरा मानना है की हम सबको मिलकर कमियों को गिनाने के बजाय उन्हें दूर करना चाहिए ताकि हमारी भूमिका और जिम्मेदारी का वास्तविक रूप से निर्वहन हो सके।

परिवर्तन चाहने के लिए दृढ इच्छाशक्ति का होना बहुत जरूरी है। इसके बिना हम सिर्फ बातें ही कर सकते हैं,परिवर्तन ला नहीं सकते। देश का इतिहास गवाह है की अगर चन्द लोगों ने दृढ इच्छाशक्ति से आजादी की ख्वाहिश नहीं जाहिर की होती और उसके लिए कदम न बढाए होते तो आज तक हम गुलाम भारत में रहकर यही बातें कर रहे होते की व्यवस्था खराब है,हम आजाद नहीं हैं,हम अपनी मर्जी से जी नहीं सकते इत्यादि, इत्यादि......

पाठकों यदि हम वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं और सुधार चाहते हैं तो एकजुट होकर दृढ इच्छाशक्ति से व्यक्तिगत स्वार्थों को त्यागकर मिलजुलकर एक शुरुआत करें ताकि हम अपने सपनों के भारत का निर्माण कर सकें.....

आइये कदम बढाएं......

जय हिंद......


Tuesday, August 17, 2010

अपनी शक्ति से अनजान युवा......



मेरे देश का ये नौजवान इस तरह किस चीज के लिए गिडगिडा रहा है और क्यों......? और इसके साथ इस तरह क्यूँ पेश आया जा रहा है.......? क्या यह आतंकवादी है.......? क्या यह अपराधी है......? अगर नहीं है तो क्या कर रहा है मेरा ये युवा साथी......?

ऊपर लगी तस्वीरों में आप देख सकते हैं की मेरे देश का नौजवान साथी जो आने वाले समय में देश का निर्माता बनेगा उसे क्या हो गया है, क्यूँ अपनी इस शक्ति का दुरूपयोग कर रहा है.........? जब हम यह मानते हैं की पूरी दुनिया युवा शक्ति पर टिकी है चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, सामरिक क्षेत्र हो, राजनीतिक क्षेत्र हो या सामाजिक क्षेत्र हो, फिर भी क्यों वह अपनी शक्ति का अहसास नहीं कर पा रहा है.........?

वैश्विक अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से युवा वर्ग पर टिकी है, प्रत्येक वस्तु का सबसे बड़ा उपभोक्ता युवा है, कोई भी नयी वस्तु हो उसे बाजार में लाते समय युवा वर्ग की पसंद नापसंद को ध्यान में रखा जाता है, अधिकाँश वस्तुओं को युवा ही बाजार उपलब्ध करवाता है...... सही मायने में वही बाजार का राजा है।

देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी युवा कंधो पर है, देश के लिए मर मिटने वालों में युवा ही सबसे आगे होते हैं।

देश का लगभग 60 फीसदी मतदाता युवा है। वही निर्धारित करता है की देश की बागडोर किसके हाथो में होगी। वह सरकार बनाने और गिराने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है तो फिर व्यवस्था में खामियों का दोष किन्हें व क्यों दिया जा रहा है......?

हमारे समाज में भी प्रत्येक सामाजिक गतिविधि का संचालन बुजुर्गों के अनुभवों को साथ लेकर भरपूर ऊर्जा के साथ युवा ही करता है।

इतना सबकुछ होने के बावजूद हमें आज भी अपनी युवा शक्ति का अहसास ही नहीं हुआ है, की हम क्या हैं, और क्या कर सकते हैं........! हम् में से अधिकांश का उद्धेश्य सिर्फ अच्छी नौकरी पाना, पूर्ण सुख सुविधाओं से भरपूर जीवन जीना और मौज मस्ती करना मात्र ही क्यों रह गया है.......? जिस व्यवस्था के हम खराब होने की बाते करते हैं, चर्चा करते हैं, शिकायतें करते हैं......! इतने शक्तिशाली होने के बावजूद क्या हम उन्हें बदलने का प्रयास तक नहीं कर सकते.....!

क्या हो गया है हमें, जब हम बाते कर सकते हैं, रैलियां निकाल सकते हैं, किसी के कहने में आकर धरना प्रदर्शन कर सकते हैं तो क्या हम एकजुट होकर इस व्यवस्था को बदलने के लिए दृढ़ता से कुछ नहीं कर सकते......? गलती हमारी ही है, जब हम हजारों की तादाद में इकठ्ठा होकर रैलियां निकालते हैं तो हम संयमित और नियंत्रित होकर अपने प्रयास को अंजाम तक नहीं पहुंचा सकते? सबसे ज्यादा जरुरी है हम नियंत्रण में रहकर अपनी बात कहें.

हमें एकजुट होकर, इकट्ठे होकर यह महसूस करवाना है की हम कितने शक्तिशाली हैं न की अनियंत्रित होकर हमारे साथ किसी को भी अपराधियों की तरह पेश आने की छूट देनी है, न ही किसी को ये मौका देना हे की कोई हमारी शक्ति को गाली दे, हमें हुडदंगी कहकर पुकारे और हमारे प्रयास को अराजकता फैलाने वाला करार दिया जाए।

आज हमारी शक्ति छोटे-छोटे अणुओं के रूप में विभाजित है, जिसे हमें मिलकर, एकजुट होकर परमाणु शक्ति के रूप में बदलना है, ताकि हम अपनी उस शक्ति का उपयोग देश के विकास में ले सकें और विश्व में सबसे बड़ी ताक़त बनकर उभरें.............

Tuesday, August 10, 2010

कोमनवेल्थ खेलों पर राजनीति............


कोमनवेल्थ खेलों पर हो रही लगातार खींचतान और राजनीती से आप सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं , इस आयोजन को लेकर एक-दुसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप और इस पर खर्च किये जाने वाले धन को लेकर जो भी तमाशा चल रहा है वह हम सभी की नजर में है। लेकिन यह सब करने वालों ने कभी यह सोचा है क्या, की इस सब से मेरे देश की छवि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कितनी धूमिल हो रही है..........

हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है की इन खेलों की मेजबानी हम कर रहे हैं। विश्व भर के देश उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं की उन्हें इस तरह का मौका मिले और ऐसे अवसर पर हमारे ही लोग इस आयोजन को सफल बनाना तो दूर इसे पूरी तरह बिगाड़ने पर तुले हुए हैं।

मुझे लगता है की इस देश में राजनीती कर रहे लोगों के राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वार्थ देश से भी बढ़कर हैं और उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं की विश्व जगत में हमारी कितनी किरकिरी हो रही है......


जरा सोचिये जब राज्यवर्धन राठोड, विजेंद्र सिंह और इसी तरह देश के बहुत से खिलाडी ऐसे आयोजनों के माध्यम से देश में जब पदक लेकर लौटते हैं तो पूरा देश उनकी अगवानी करता हुआ क्यों पलक-पांवड़े बिछा देता है............? और राजनीति करने वाले यही लोग क्यों उनके लिए ढेरों सुविधाओं और इनामों की घोषणा करते हैं............? क्योंकि वो हमारे देश का मान पूरे विश्व में ऊंचा करके आते हैं..........


ये हमारी अंदरूनी बात है की इस आयोजन को लेकर यदि किसी प्रकार से धन के दुरूपयोग, भ्रष्टाचार या अव्यवस्था की बात सामने आती है तो सम्बंधित गुनाहगार या दोषी को सजा अवश्य मिलनी चाहिए, लेकिन इस सब से पहले इस कार्यक्रम की सफलतापूर्वक सम्पन्नता के लिए सभी को मिल-जुलकर प्रयास करना होगा ताकि विश्व पटल पर मेरे देश की जो एक छवि बनी हुई है उसको किसी तरह का कोई आघात न पहुंचे।

मेरी नजर में सबसे बड़े दोषी वो लोग हैं जो इस देश के मान को अघात पहुंचा रहे हैं, उन्हें सबसे पहले दण्डित किया जाना चाहिए तथा उन्हें तब तक प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए, जब तक यह आयोजन पूर्ण रूप से सफलतापूर्वक संपन्न न हो जाए ताकि वे किसी भी रूप में इसकी खिलाफत करने का प्रयास न कर सकें।
इस देश का मान-सम्मान बनाए रखना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है......

Thursday, July 29, 2010

फिजूलखर्ची या रोजीरोटी.........


इन दिनों शादियों का सीजन जोरों पर है साथ ही इससे जुड़े तमाम प्रकार के व्यवसाय और व्यवसायियों की आजकल पाँचों उँगलियाँ घी में और सर कढाई में है।

देखा जाए तो जहां एक तरफ शादी समारोह में होने वाले खर्च की राशि करोड़ों और अरबों को छू रही है वहीँ दूसरी तरफ एक पूरे का पूरा तबका भूखे पेट सोने को मजबूर है।

मैं एक साधारण नागरिक की हैसियत से अगर सब से यह प्रश्न करू की क्या ये सब उचित है......? विवाह समारोह में होने वाला बेहिसाब खर्चा, क्या सिर्फ दिखावा मात्र नहीं है.......? क्या यह सिर्फ अपने status और एक वर्ग विशेष को बनाए रखने का रूप नहीं है........?

दोस्तों आपका मन भी शायद यही कह रहा होगा की वास्तव में कहीं न कहीं धन की बर्बादी हो रही है, लेकिन मैं यहाँ यह नहीं कहूँगा की ये सब बंद हो जाना चाहिए, मेरी सोच कुछ जरा हटके है.......।

मुझे लगता है की इसी बहाने ही सही धन्ना सेठों की तिजोरियों में रखा हुआ पैसा बाहर आकर कितनों को रोजगार और रोटी देता है....... कही न कही, किसी न किसी रूप में इन तमाम व्यवसायों से जुड़े हुए मजदूरों को काम देता है। भला हो ऐसे कुबेरों का, जिन्हें अपने कमाए हुए धन का हिसाब तक पता नहीं है, क्योंकि ऐसे तमाम लोग प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से तो परोपकार का काम कर ही रहे हैं.......!

सोच कर देखें की यदि ऐसा बंद हो जाए या सभी सादगी पूर्वक समारोह आदि करने लग जाएं तो इसमें खर्च होने वाला पूरा धन ज्यों का त्यों उनकी तिजोरी या बेंक में पड़ा रहेगा और अर्थव्यवस्था की निरंतरता में बाधक बन जाएगा.......... मेरा मानना है की हममें से शायद ही कोई परोपकार के नाम पर सीधे तौर पर कभी किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था को कोई धन राशि उपलब्ध करवाता होगा। चलो ऐसे ही सही दिखावे और वर्ग विशेष की पहचान को बनाए रखने के लिए ही सही हमें ऐसा करते रहना चाहिए, ताकि हम भी इस पुन्य के काम में भागीदार बन सकें........

जहां तक मुझे लगता है इस पूरी प्रक्रिया में कही न कही स्थानीय प्रशासन को भी प्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभानी चाहिए और एक निश्चित राशि से ऊपर होने वाले खर्च पर एक अति न्यूनतम चार्ज सामाजिक कल्याण कर के रूप में आयोजक से वसूल किया जाना चाहिए, क्योंकि ये मामूली राशि आयोजक के लिए तो भारी नहीं होगी लेकिन इससे सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए राशि एकत्रित हो सकेगी और सीधे तौर पर जरूरतमंद के काम आ सकेगी....

Tuesday, July 27, 2010

मेरी एक छोटी सी पहल........................



हम लोगो में एक आदत है की हम उपदेश और सलाह बहुत अच्छी देते हैं और वो भी बिना मांगे.........!!!!! मुझे भी लगा की बातें अब बहुत हो गई, मैंने भी विचारों और भावनाओं के माध्यम से जल को बचाने और संरक्षित करने की दलीलें बहुत दे दी...........

मेरा मन नहीं माना, मुझे लगा की कही कोई कमी है..... इसलिए मैंने तुरंत अपने घर के बीचोबीच घास के बगीचे के लिए जो जगह थी उसको खुदवा डाला, मैंने बहुत सोच-विचार कर बारिश के पानी को संरक्षित करने और रोजाना घरेलु उपयोग में आए हुए जल को धरती के गर्भ में पहुचाने का प्रारूप तैयार किया।

मैने अपने पास उपलब्ध जगह में एक 10*10 फीट चौड़ा और 10 फीट गहराई वाला बड़ा टेंक तैयार किया जोकि नीचे से पूरा पक्का था और इसी के साथ एक छोटा टेंक 3*3 फीट चौड़ा और लगभग 25 फीट गहराई वाला तैयार किया, जोकि नीचे से कच्चा था। अब मैंने दैनिक उपयोग में आए हुए जल के निकास को उस कच्चे टेंक के साथ जोड़ दिया ताकि वो शुद्ध होकर सीधा धरातल में जाता रहे।

और दुसरे वाले टेंक को मैंने पुरे घर के बारिश वाले पानी के निकास-द्वार से जोड़ दिया ताकि बारिश का पूरा पानी उसमे एकत्रित हो सके और साथ ही उसके पुरे भरने के बाद, अतिरिक्त जल का निकास उस कच्चे टेंक के साथ जोड़ दिया, जिस से इसके भरने के बाद बचा हुआ जल भी सीधा जमीन में जाता रहे। मैंने ये महसूस किया की इस तरह करने से जल व्यर्थ नहीं बहेगा और सीधा जमीन में जाकर जल के स्तर की वृद्धि में सहायक होगा।

आज जब बारिश का मौसम है और इस दौरान मेरे घर से पानी ,की एक बूँद भी व्यर्थ बाहर नहीं जाती है तो ये देखकर मेरे दिल को जो सुकून मिलता है उसे मैं बयान नहीं कर सकता, लगता है की मैं अब अपनी भूमिका का निर्वहन वास्तविक और सही रूप में कर रहा हूँ।

मैं चाहता हूँ की मैंने जो छोटी सी पहल की है इसी प्रकार किसी भी रूप में जल को धरती के गर्भ में पहुचाने के लिए आप जो भी प्रयास कर सकते हैं जरुर करें.........




Friday, July 23, 2010

मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश.....


इन दिनों मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की चर्चा चल रही है। अब सामान्य सी बात है की जब परिवर्तन की बात हो रही है तो विरोध भी होगा, विरोध करने वाले कह रहे हैं इसे लागू कर देश के करोडो छोटे दूकानदार, किसान, और कारोबारियों के हक़ पर डाका डाला जा रहा है...

हम देखते आ रहे हैं की जब भी परम्परागत रूप से चली आ रही सोच में परिवर्तन की बात की जाती हैं तो इसी तरह विरोध के स्वर उठने लग जाते हैं। हम बेशक आधुनिक होते जा रहे हैं फिर भी परिवर्तन को स्वीकारने में परेशानी क्यों होती है उदाहरण के लिए एक सामान्य सी बात बताता हूँ जब कंप्यूटर का दौर शुरू होने जा रहा था तो सबने सुना होगा की अब तो ऐसी मशीन आ रही है जो 10 आदमियों का काम अकेले ही निपटा देगी, बाकि सबको काम से निकाल दिया जाएगा, इसकी वजह से हम बेरोजगार हो जाएंगे पर क्या आपको लगता है की ऐसा हुआ.......?


यदि मल्टी ब्रांड रिटेल में बड़ी विदेशी कम्पनियां निवेश करती हैं तो इसका मतलब ये थोड़े ही है की स्थानीय मौजूदा व्यवसाइयों को निकाल बाहर कर दिया जाएगा। ........... किसी नए निवेशक के आने से मौजूदा व्यवसाइयों को हानि होने की बात ही नहीं उठती है क्योंकि आने वाले निवेशक देश में अपने दुकानदार या व्यवसायी थोड़े ही साथ लेकर आते हैं.........! साथ आएगी तो एक व्यवस्थित प्रक्रिया, बेहतर सुविधाएँ, और उत्तम उत्पाद।


आप सब जानते हैं देश में पहले से ही कई विदेशी कंपनियों के आउटलेट्स स्टोर आदि हैं पर आपने वहा अपने ही देश के लोगो को काम करते हुए देखा होगा और साथ में हमें मिल रही हैं बेहतरीन सेवाएं और विश्वसनीय वस्तुएं .... इसी परिप्रेक्ष्य में मैं आपको एक बात बताता हूँ, अगर मौजूदा छोटे दुकानदार, या व्यवसायी उपभोक्ता की पसंद और वस्तु की गुणवत्ता का ध्यान रखते हैं तो उनके व्यवसाय को कोई हानि नहीं होती है, जैसे की जब देश में Reliance Fresh आया तो ठेले पर या परंपरागत रूप से सब्जी और फल बेचने वालों ने सोचा की जब इतना बड़ा व्यावसायिक घराना सुनियोजित तरीके से इस काम को करेगा तो हमारा व्यवसाय तो ख़त्म हो जाएगा, पर क्या ऐसा हुआ....? उसका एकमात्र कारण...... Reliance Fresh ने जो दावा किया की उनके फल और सब्जी सबसे ताजा मिलेंगे, उपभोक्ता को संतुष्ट नहीं कर सका और आज भी आप और हम फल और सब्जियां सब्जि मंडियों और ठेले से लेना पसंद करते हैं न की Reliance Fresh या इस तरह के उपलब्ध अन्य स्थानों से।

यहाँ सरकार को दोष देने का कोई औचत्य ही नहीं है, सरकार द्वारा विविध क्षेत्रों में पहले भी विदेशी निवेश स्वीकार किया जाता रहा है और यह आवश्यक भी है और जहाँ तक उपभोक्ता क्षेत्र की बात है तो सरकार को दोष दिया जाना हास्यास्पद लगता है क्योकि यह प्रतिस्पर्धा का दौर है, आज का उपभोक्ता बहुत विवेकशील है, उपभोक्ता बाजार का राजा है जो उसे उत्तम लगेगा बाजार का सिरमौर वही होगा। इस से उपभोक्ता को उच्च क्वालिटी की वस्तुएं उपलब्ध होंगी। आप सभी इस बात से भलिभांति परिचित हैं की वर्तमान में जीवन स्तर उन्नत हुआ है, एक आम उपभोक्ता की पसंद बदली है, अब उपभोक्ता बेहतरीन उत्पाद के लिए ज्यादा पैसा देने को भी तैयार है, उसे सबकुछ साफ़-स्वच्छ और विश्वसनीय चाहिए। इसके लिए जरुरी है की रिटेल का स्तर बढाया जाए उसमे यदि विदेशी निवेश से बात बनती दिख रही है तो परहेज कैसा.....?

यदि हमें बेहतर सुविधाएँ मिल सकती हैं तो हैं तो अन्य क्षेत्रों की तरह ही आने दीजिये विदेशी निवेश को अपने देश की रोजमर्रा की जरूरतों में, यह हमारे लिए ही तो है। हमें अपना दृष्टिकोण व्यापक करते हुए और परिवर्तनों का स्वागत करना चाहिए।

Monday, July 5, 2010

आज भारत बंद, कल से होगी मंहगाई कम......!



यह सच है की मंहगाई दिन प्रतिदिन बढती जा रही है, हर चीज के दाम आसमान छूने लगे हैं। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है.................?

आप.......?
हम........?
सरकार......?
या फिर हम सभी.....?
मंहगाई की समस्या के समाधान के लिए भारत बंद एक कारगर उपाय है....! और कल से ही हमें सभी चीजें सस्ती मिलने लगेंगी....! क्या आप भी ऐसा ही सोचते हैं............?

मंहगाई से निपटने के लिए बंद के समर्थकों ने दलगत राजनीती से ऊपर उठकर मंहगाई कम करने के लिए कोई सकारात्मक संभावनाएं तलाशी होती तो कितना अच्छा होता..........

बंद से मंहगाई पर असर पड़े या न पड़े, इस से आप और हम किस कदर प्रभावित होते हैं यह हम से बेहतर कोई नहीं जान सकता। हर आदमी परेशान होता है, लोगो के काम अटक जाते हैं, फिर उस समय हम मंहगाई को नहीं, बल्कि बंद करने वालों को कोसते हैं.......!

इस बंद के बहाने आज देश में जो भी घटा है उस से आप सभी भलिभांति परिचित हैं और यदि नहीं भी हैं तो बंद के नाम पर आज हुए तमाशे से कल सवेरे अखबार के माध्यम से परिचित हो जाएंगे। इन उपद्रवों के बीच मुख्य मुद्दा तो गायब हो गया और उत्पाती एवं उपद्रवी लोगो के वारे-न्यारे हुए हैं। उन्हें मौका मिल गया जोर-जबरदस्ती करने का, बाजार, संस्थान आदि को बंद करवाने का, आवागमन के साधनो को रोकने का, लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करने का, आप ही बताइये क्या ये तरीका सही था...........?

आप और हम यदि सरकारें बनाते और गिराते हैं तो फिर चन्द लोगो की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती है की वे पूरे आम जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं........? कब हम लोग एकजुट होंगे और ऐसे उत्पाती एवं उपद्रवी लोगो को अपनी दिनचर्या को थामने से रोकेंगे..............!

इस सबके विपरीत मंहगाई को रोकने के लिए सकारात्मक प्रयास भी किये जा सकते हैं। इस के लिए आवश्यक है की सरकार एवं विपक्ष निजी स्वार्थ को छोड़कर एकजुट हों एवं इस समस्या के समाधान के लिए स्वस्थ रननीति तैयार करें जिसके तहत देश आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो तथा मंहगाई कम हो सके।


Friday, June 11, 2010

यूं रोकेंगे अपराध............!

अब आप खुद ही फैसला करें........

आज सुबह के अखबार की एक हेडलाइन ने मेरे अंतर्मन को झंझोर कर रख दिया। मेरे प्रदेश में हुई एक घटना ने मानवता को शर्मसार कर दिया.................

खबर कुछ इस तरह है की कानून के रखवालों ने 75 साल के एक बुजुर्ग को दोनों हाथ बाँध कर पेड़ पर लटका दिया................ राज उगलवाने का कितना निराला अंदाज है पुलिस का.................................!! क्या इस तरह के अमानवीय कृत्य को बर्दाश्त किया जाना चाहिए?

उस पुलिसवाले को निलंबित करके अधिकारियों ने खानापूर्ति तो कर ली, लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता की इन लोगो के मन में ऐसा नहीं करने का भय क्यों नहीं उत्पन्न होता? जहाँ तक मुझे लगता है इस तरह की खानापूर्ति से इनका कुछ नहीं बिगड़ता तभी तो ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं। कानून के रखवाले न्यायपालिका का काम भी खुद ही कर लेते हैं...................! इस बुजुर्ग के ऊपर चोरी का आरोप है और इसका राज उगलवाने के लिए उन्होंने क्या तरीका अपनाया है...! धन्य है ऐसी पुलिसिया सोच................

दूसरी तरफ मेरे हिंदुस्तान का मुजरिम कसाब, जिसने सरेआम लाशें बिछा दी उसकी तीमारदारी में क़ानून के रखवालों ने करोडो रुपये खर्च करवा दिए और उसकी सजा मुक़र्रर करने में इतना समय गवां दिया माना की ये सब एक प्रक्रिया के तहत ही होना था................... तो इस बुजुर्ग के मामले में ये तरीका क्यों अपनाया गया। ऐसे और भी काफी उदाहरण हैं और आप सभी उनके बारे में जानते हैं?

ऐसे अमानवीय कृत्य हों और हम चुपचाप बर्दाश्त कर लें...............?
कब तक चुप बैठें................?
क़ानून के रखवालों के हाथों कानून की धज्जियां कब तक उड़ते देखें..............?
अगर इस तरह के अमानवीय कृत्यों पर हम चुपचाप बैठे रहे तो हमारा कोई धनीधोरी नहीं है...........




Saturday, June 5, 2010

पर्यावरण हमारी जिम्मेदारी....


आओ आज फिर मना लें पर्यावरण दिवस. अपने अपने तरीके से पर्यावरण बचाओ रैली, रन फॉर एन्वायार्मेंट, विचार गोष्ठियां और वृक्षारोपन कार्यक्रम आयोजित कर आज के दिन को सार्थक कर लें!....................

आपकी जानकारी के लिए आपको एक बात बताता हूँ, मैं तकरीबन पिछले 15-20 वर्षों से लगातार पर्यावरण दिवस मनते हुए देख रहा हूँ और प्रत्येक वर्ष इसी तरह के ढेरों आयोजन किए जाते हैं लेकिन मुझे ये समझ नहीं आता है की पिछले 20 साल में लगाए गए पेड़ कहा गए???

इतनी जागरुकता हमने फैलाई इस पर्यावरण को बचाने के लिए पर आज भी यह दिनों-दिन बदतर क्यूं होता जा रहा है???

सरकार ने कितनी सारी योजनाए बनाई, कितना बजट आवंटित किया पर स्थिति जस की तस क्यों है???

अनेको स्वयंसेवी संस्थाएं इस क्षेत्र में कार्यरत हैं फिर क्यों नहीं बच पा रही है धरती???

पर्यावरण को लेकर आए दिन चिंतन बैठकें, अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित किए जाते हैं पर कोई सकारात्मक परिणाम क्यों नहीं निकलता???

हो सके तो आप भी खोजना इन प्रश्नों के जवाब... ये जो लगातार हम बड़ी बड़ी बाते बनाते आ रहे हैं और नाम कमाने के लिए पर्यावरण के नाम पर जो दिखावा कर रहे हैं उसे तुरंत बंद करके व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। अंत में आप से बस यही कहना चाहता हूँ हम वास्तव में पर्यावरण प्रेमी बने और इसके लिए सिर्फ वृक्ष लगाकर संतुष्ट न हों, उनकी सार-संभाल करें, उन्हें इस लायक बनाएं की वे पर्यावरण को सुधारने में अपना योगदान दे सकें।

Thursday, May 6, 2010

साल में सिर्फ एक दिन माँ....

आओ मदर्स डे भी मना लें!!! एक दिन माँ को महान बताकर खुद को महान साबित करने का अपना ही मजा है दोस्तों........... चाहे साल भर हमारी माँ की हमने खैर खबर भी न ली हो, चाहे हमारे पास प्यार से उसके साथ बैठने के लिए दो पल की भी फुर्सत न हो पर अपने यार दोस्तों, रिश्तेदारों को सुबह सवेरे से ही हैप्पी मदर्स डे तो विश कर ही सकते हैं, ताकि कही कोई ये न कह दे की-------------------- "बड़े बिजी हो गए अब तो भाईसाहब, विश करने तक का टाइम नहीं है!" ----------------


बनाने वालों ने दिन फिक्स कर दिए और लोग ठहरे लकीर के फ़कीर....! अपने-अपने फायदे के हिसाब से उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं । इस तरह के दिनों के सहारे किसी के कार्ड बिक जाते हैं और किसी के फूल तो किसी के अन्य उपहार की चीजें , कुछ लोगो की पार्टियां हो जाती हैं और हो गई तसल्ली की चलो मना लिया स्पेशल दिन...!!

अब वो दिन नहीं रहे जब माँ की परिक्रमा को बेटे चार धाम की यात्रा माना करते थे, माँ की एक बात मूंह से निकलने पे द्रौपदी पांचाली बन गई थी. पर आज कहानी बिलकुल अलग है, आज के बच्चो को माँ यदि कुछ पूछना चाहे तो बच्चे कहेंगे, "ये आपके मतलब की बात नहीं है". ये तो आज का ट्रेंड बन गया है. मैंने देखा है कुछ घरो में जब बटवारा होता है और तो बेटे माँ-बाप को भी बाँट लेते हैं, और स्थिति तब ज्यादा दयनीय होती है जब पिता की मौत के बाद माँ बांटी जाती है........ मन में भावनाए नाम की नहीं हैं, ऐसे में ये मदर्स डे का दिखावा समझ में नहीं आता!!! आपको आए तो मुझको जरुर लिखना.



किसी खुशी या प्यार के इजहार, किसी के प्रति सम्मान व्यक्त करने या अपनी किसी भावना की अभिव्यक्ति के लिए साल के एक दिन की क्या जरुरत है???? साल के एक दिन वेलेंनटाईन डे को प्यार जाता दिया, हो गई प्रेम की पूर्ति, एक दिन धरती की फ़िक्र कर ली और पूरा हो गया वर्ल्ड अर्थ डे का औचित्य!! ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। आप ही बताइये खुद को एक दिन में बांधकर कोई फायदा है क्या? पूरे साल उस कर्तव्य का निर्वाह भी होना चाहिए, पौधा लगाने का क्या मतलब जब तक उसकी सार-संभाल ना की जाए.

मेरा तो यही मानना है, की अपनी माँ के प्रति अपने प्यार का इजहार सिर्फ साल के एक दिन क्यों? ये रिश्ता तो जीवनपर्यंत है, जिसे हमेशा प्यार से निभाना है......

Tuesday, April 27, 2010

जीने के लिए.................

जब भी मैं यहाँ अपने विचार बाँटता हूँ आप सभी को अपने से जुडा हुआ महसूस करता हूँ. आप तो जानते हैं पहले जहा तालाब हुआ करते थे वहा दूर-दूर तक पानी का नामो-निशाँ नहीं है. रोज हम समाचारों, विज्ञापनो, अखबारों में पानी की किल्लत से दो-चार हो रहे हैं. पर क्या वाकई इन सबका हम पर गहरा असर होता है? ऐसा नहीं है की हम समस्या को अनदेखा कर देते हैं, हम खबर को बाकायदा पढ़ते हैं, सुनते हैं, उस पर चिंता भी व्यक्त करते हैं!!!! फिर वही धाक के तीन पात, फिर रोजमर्रा के कामकाज में लग जाते हैं.....! हो सकता है आपमें से अधिकतर पानी की समस्या से नहीं गुजर रहे हों, आपको अपनी आवश्यकतानुसार पानी आराम से उपलब्ध हो. जब आसानी से कोई चीज मिल रही है तो उसकी कद्र कौन करे.....? ये तो जग जाहिर है, जाके पैर न फटे बिवाई सो का जाने पीर पराई.... पानी को व्यर्थ बहाना शहरी क्षेत्र में ही ज्यादा देखने को मिलेगा, गावो, बस्तियों, और दूर-दराज के इलाकों में आप जाके देखो पानी को काफी सोच-समझ के इस्तेमाल किया जाता है, जाहिर सी बात है होगा भी, उन्हें उसके लिए मशक्कत जो करनी पड़ती है.

मैं यहाँ यह बिलकुल नहीं कह रहा हूँ की एक-दो बाल्टी पानी रोज बचाओ, या आप अपनी जरुरी आवश्यकताओं पर पानी के खर्च में कटौती करो, ऐसी बाते बेवजह के तर्क हैं. मैं तो बस आपसे तीन बाते कहना चाहता हूँ............

एक-- तो हम पानी को बर्बाद न करें भले ही हमारे पास बेतहाशा उपलब्ध है, क्योकि हो सकता है कल न हो।

दूसरी बात-- हम घर में रोजमर्रा की जरुरतो में काफी पानी उपयोग में लाते हैं मसलन- बर्तन, कपडे, नहाने-धोने में, ये पानी बस एक बार उपयोग में आके हमेशा के लिए प्रदूषित हो जाता है. हम इस पानी को रिसाइकिल कर के पीने के अलावा सामान्य जरुरतो में काम में ले सकते हैं, बस थोडा सा ध्यान देने की जरुरत है, हमारे घर का पानी हमारे बार-बार काम आता रहेगा फिर न तो हमें भटकना पड़ेगा और न ही धरती का सीना छलनी करना पड़ेगा।

तीसरी बात है-- बारिश के पानी की, आपको पता है प्रकृति हर जगह जल बरसाती है, गावो , दूर-दराज के हिस्सों में तो वो रिस-रिसके जमीन में चला जाता है पर शहरी इलाकों में सब बर्बाद हो जाता है. हम थोड़ी सी जागरुकता दिखा कर इसे बर्बाद होने से बचा सकते हैं और अपनी धरती और इस पर रहने वाले सभी जीवो का कल सुरक्षित कर सकते हैं. यहाँ एक बात अपने मन से निकाल दीजिये -की मैं ऐसा क्यों करू?, मेरी जरुरत तो पूरी हो रही है न, नहीं ये गलत है। आप बताइये कितना दुखद मंजर होगा वो जब हमारी धरती पर लोग पानी के लिए मर रहे होंगे ......! कुछ लोग सोचते हैं वो दिन अभी काफी दूर है तो ये बताइये आग लगे पर कुआ खोदना कोई समझदारी है? नहीं ........, तो आज से ही तैयारी क्यूँ न की जाए हम सभी के भीतर एक विवेकशील मस्तिष्क है, आज की सामान्य समस्या को हम कल भयावह होने से रोक सकते हैं।

कुदरत का बेशकीमती वरदान है जल, इसे सहेजिये, एक बार कर के देखिये, तो आप पाएंगे अपने घर में प्रकृति की देन का यह भंडार आपके मन को आपके बैंक बैलेंस से भी ज्यादा सुकून देगा......... मानवधर्म निभाइए और अपने, अपने परिवार, आस-पड़ोस एवं समाज सभी के लिए मिसाल कायम कीजिये, फिर देखिये आपकी एक छोटी सी कोशिश कैसे रंग लाती है।

अंत में बस आपसे ये कहना चाहता हूँ पानी नहीं बचा तो कुछ नहीं बचेगा और अपने अंत की रुपरेखा तो हम तैयार नहीं सकते हैना? ये धरती हमारी है, ये हमें जीवन देती है तो इसकी सुरक्षा भी तो हमें ही करनी है और इसकी अनमोल देन- जल को सहेज कर सच मानिए हम अपना ही भला करने जा रहे हैं न की किसी पर अहसान....

Sunday, April 11, 2010

इंडियन प्रीमियर लीग: कहाँ है इंडिया?...

देश में चल रहे आईपीएल के बुखार में आप भी बुरी तरह जकड़े होंगे। हो सकता है आप इस भीड़ में शामिल न हों, पर इस आईपीएल ने देश के युवाओं की जो हालत की है वो तो जग जाहिर है। मैं यहाँ खेल की बुराई कतई नहीं कर रहा हूँ पर में तो खेल के तरीके से व्यथित हूँ. हम कहाँ जा रहे हैं, किस चीज का हिस्सा बन रहे हैं, खुद हमें नहीं मालूम. हम बस उस तरह की प्रतियोगिता को बढ़ावा दे रहे हैं जिसमे सबकुछ पैसे के लिए होता है, जिसमे देश के चंद सौदागरों ने खेल को खरीद लिया है। मन में एक टीस सी उठती है की, बिकने के लिए तो देश में पहले ही काफी कुछ है, कम से कम खेल और खेल की भावना को तो बख्श देते। पर इस से भी दुःख की बात यह है की ये सब खुलेआम बड़े आराम से चल रहा है और सब राजी-राजी इसका आनंद ले रहे हैं। ऐसे ही आँखे मूंदे बैठे रहे तो ऊपरवाला ही जाने आगे इस खेल में और कितने खेल देखने को मिलेंगे!

आईपीएल के नाम से खिलाडियों की बोली लगी ,जिनका क्रिकेट से कोई सरोकार नहीं है उन्होंने मोटी रकम हाथ में लिए खिलाडियों की कीमत तय कर ली। जिन्हें देश का बच्चा-बच्चा अपना रोल मॉडल मानता है वो सरेआम बिक गए ! कभी सोचा है, इस नाटक में शामिल लोगो ने इस तरह खेल और खिलाडियों की बोली लगने का देश के बच्चो में क्या सन्देश जाता होगा? देखिये तो सही खरीददारों ने अपनी-अपनी जेब के हिसाब से देशी विदेशी खिलाडियों को मिला-मिलूकर भानुमती के कुनबे सरीखी टीमे तैयार करली और बाजार में टिकने के लिए आकर्षक नाम दे दिए और हो गया तमाशा शुरू. आयोजक धन की बारिश कर रहे हैं और सब के सब पैसे के लिए खेल रहे हैं। आज यह खेल फ़टाफ़ट नाम और पैसा कमाने का साधन बनता जा रहा है। तभी तो राजनेता भी खेल के अखाड़े में उतर आए हैं, जिनका क्रिकेट से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था! कोरपोरेट घराने, खिलाडी, राजनेता सभी के हित देश से ऊपर होते दिखाई दे रहे हैं. सब मिल बांटकर बटोर रहे हैं और लुट रहे हैं हम, तार-तार हो रही है देश की खेल संवेदनाएं।

हमारे देश के अन्दर जब पहले से ही राज्यों की टीमे मौजूद हैं तो नई टीम गठित करना और इसके लिए बाहरी खिलाडियों की जरुरत तो बिलकुल समझ में नहीं आती। हमारे देश में भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। राज्यों में अपने क्रिकेट बोर्ड हैं, अपनी टीमे है। कितना अच्छा होता की बिना इस आईपीएल के दिखावे के अपने ही राज्यों की टीमो के बीच सुखद प्रतिस्पर्धा होती. हर राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व हमारी अंतर्राष्ट्रीय टीम के खिलाडी करते। हा थोड़ी कमाई कम होती पर सच मानिए इस से देश की युवा प्रतिभाएं उभर कर आती, उन्हें निखरने का मौका मिलता जो बस आज एक मौके की आस में इन सौदागरों का मूंह ताकती रहती हैं। इस तरह हमारे खिलाडियो के खेल का स्तर बढ़ता और आने वाले विश्वकप में सर्वश्रेष्ठ खिलाडी भारत का प्रतिनिधित्व करते और हमारी दावेदारी मजबूत होती। बड़े दुःख की बात है आज देश की प्रतिभाओं का देश में ही खेलना दूभर हो गया है, अंतर्राष्ट्रिय टीम में चयन तो दूर की बात है और कडवी सच्चाई ये है की ये सब अपनों का ही किया धरा है।

क्रिकेट में धन की बारिश हो रही है चंद देशी-विदेशी खिलाडी, धनी आयोजक और घराने साथ मिलकर नाम, पैसा, शोहरत के मालिक बने बैठे हैं। शीर्ष पर बैठे इन लोगो के दोनों हाथ घी में और सर कढाई में हैं वही दूसरे खेल और खिलाड़ी ख़ाक छान रहे हैं, हमारा राष्ट्रीय खेल गुमनामी के अँधेरे में डूबता जा रहा है. हॉकी की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है, यही हाल कमोबेश अधिकतर खेलो का है। शाहरुख हॉकी पर फिल्म बनाते हैं, नाम, पैसा, स्टारडम, सहानुभूति, और खूब वाहवाही लूटते हैं पर वास्तविकता में क्रिकेट के साथ हो लेते हैं। हमारे पडोसी देश के खिलाडियों को आईपीएल में शामिल न किये जाने के दर्द का अहसास उन्हें है, पर जिस खेल पर उन्होंने पूरी फिल्म बना डाली उसकी गिरती दशा पर कोई प्रतिक्रया नहीं! उल्लेखनीय है की हमारे देश में दर्शक परदे पर दिग्गज अभिनेताओं की प्रस्तुति को काफी गंभीरता से लेते हैं और अभिनेता को उसके साथ जोड़कर देखते हैं। पर उगते सूरज को सलाम तो दुनिया का दस्तूर है और ऐसा करने वाले अकेले शाहरुख ही तो नहीं हैं।

सब से जादा तो मैं मीडिया के खिलाफ हूँ। कहने भर को लोकतंत्र का तीसरा स्तम्भ है पर देश की वास्तविक समस्याओं से पल्ला झाड रखा है। इन्हें बस लम्बी चलने वाली मिर्च मसालेदार खबर चाहिए। टीआरपी बटोरने के लिए बेतुके मुद्दों को तूल देना जगजाहिर है। वैसे तो आपके साथ खुलकर इस दर्द को बाँटना चाहता हूँ पर अभी बात क्रिकेट के बारे में ही करते हैं. मिडिया हमेशा क्रिकेट खिलाड़ियों को सुर्ख़ियों में रखता है। आप सवेरे देश-दुनिया की ख़बरों के लिए टीवी चालु कीजिये आपको मुख्य खबर सुनाई देगी--- आखिर क्या है धोनी का पहला प्यार???, कही कोई क्रिकेटर हसीनाओं के साथ कमर में हाथ डाले थिरकता नजर आएगा तो किसी के अफेयर का ताजा-तरीन मामला देख आप अपना सर पीट लेंगे।

हमारी तो पूरी व्यवस्था में ही खोट है। खेल मंत्रालय कहने भर को ही है। खेल संघो, गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए अनेक कानून बने पर कागजों में ही रह गए। देश के युवा भी क्रिकेट की अन्धेर्गिर्दी और दूसरे खेलो की बेकद्री में दोषी हैं, ये बस भीड़ में शामिल होना जानते हैं और खेल भी इन के लिए मनोरंजन के माध्यम से ज्यादा कुछ नहीं है। ये अपनी रोजमर्रा की जरूरतों से इतर कुछ नहीं सोचते. यहाँ कुछ पंक्तिया याद आती हैं......



बर्बाद गुलिस्ता करने को बस एक ही उल्लू काफी है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ता क्या होगा??

ऊपर जो भी आपने पढ़ा उसे पढ़कर आपको मेरे दुःख का अहसास हो गया होगा। क्या आप और हम मिलकर खेल और खेल के स्तर में कुछ सुधार नहीं कर सकते?...............

Monday, April 5, 2010

बेहाल जनता के खुशहाल प्रतिनिधि !!!

आइये अपने जन प्रतिनिधियों को बधाई दें. यह बधाई इसलिए नहीं है की उन्होंने जनता को गरीबी, भुखमरी, असुरक्षा, से राहत दिलाने के लिए कोई सकारात्मक कार्य किया है, अरे भई यह बधाई तो उनकी पगार बढ़ने के उपलक्ष्य में है. चाहे न्यूनतम मजदूरी बढाने का मुद्दा सिर्फ मुद्दा ही रह गया हो, चाहे विधवा पेंशन के लिए 100 रूपये बढाने हेतु दसियों बार सोचना पड़ता हो. पर यह कमाल की बात है की मंत्रियों, विधायकों के वेतन-भत्तों, सुविधाओं में वृद्धि का प्रस्ताव सभी ने दलगत राजनीती से ऊपर उठकर मात्र सात मिनिट में ही पारित कर लिया. बड़ी अजीब सी बात है की अपने हित के मुद्दे पर सभी एक नजर आते हैं पर जनता के हितों पर सभी क्यों बिखर जाते हैं? वहां संयुक्त इच्छाशक्ति क्यों नहीं नजर आती?
हालाँकि कुछ दलीय विधायको ने विरोध दर्ज किया, पर विरोध के स्वर इतने बुलंद नहीं रहे जैसेकी पिछले दिनों आम जन-हितों पर बहस या चर्चा के दौरान अचानक उत्तेजनात्मक हो जाया करते हैं और जनहित की कीमत पर सदन का पूरा की पूरा दिन नेताओं की हठधार्मिता की भेंट चढ़ता रहा. पेयजल, सिंचाई, मंहगाई जैसी समस्याएँ उठाने की बजाये मारपीट और हंगामेबाजी होती नजर आती है और सदन के साथ पूरे प्रदेश की मर्यादा ताक पर रख दी जाती है. जब मन में लड्डू फुट रहे हों तो विरोध मात्र औपचारिक ही रह जाता है।
अरे भई चुनाव जीतकर आए दूसरा साल हो चला है, कब तक आम जनता का ही दुखड़ा सुनेंगे और उसके बारे में ही सोचेंगे! मान लीजिये उसकी समस्याएँ हल हो भी गई तो अगले चुनावों में मुद्दा कहाँ से लाएंगे? कितनी लुभावनी बातें कहकर जनता से वोट ऐंठे, कितना पैसा पानी की तरह बहाया, तब जाकर कुर्सी मिली है तो कुछ अपना सोचने में क्या हर्ज है! वोट के कागज़ से नोट ही तो छाप रहे हैं. रही आम जनता की समस्याएँ, तो उन पर फुर्सत में विचार होता रहेगा.
वैसे भले ही राजस्थान पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आता हो पर अपने वेतन बढाकर हमारे जनप्रतिनिधियों ने राजस्थान को तकरीबन डेढ़ दर्जन राज्यों यथा- पंजाब, गुजरात, दहली, आँध्रप्रदेश, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि से आगे कर लिया है और लगभग आधे दर्जन तो हमसे पहले से ही पीछे चल रहे थे. नए हिसाब से मिलने वाले वेतन-भत्तों में दैनिक बैठक भत्ता, कार्मिक के एवज में 20000 रूपये, रेलयात्रा , आदि समेत सभी सुविधाओं को मिला दिया जाए तो एक-एक विधायक 80000 रु. लेकर निहाल होता दिखाई दे रहा है. उल्लेखनीय है की वर्ष 2009-10 में प्रति व्यक्ति आय 3400 रूपये प्रतिमाह रही. इसके मुकाबले राजनेताओं के 80000 रु. दल-रोटी के लिए तरसती जनता के मुह पर तमाचे की तरह हैं. बढे हुए वेतन भत्ते, आधुनिक सुविधाएँ, ऐशो आराम की जिन्दगी, मुफ्त का पानी बिजली, सरकारी आवास, काम करने को सरकारी कर्मचारी, आदि का सुख भोगने वाले कथित जनप्रतिनिधियों से जनता के दुःख में भागिदार होने की उम्मीद करना बेमानी है. भरे पेट जब इंसान को अपनी भूख का ही अहसास नहीं होता तो जनता की किसे पड़ी है!
जन समस्याओं पर आवाज बुलंद करने के बजाय अपनी सुविधाओं का इंतजाम उससे खिलवाड़ है. हमारी नाक के नीचे सारा तमाशा चल रहा है और हम कुछ नहीं कर रहे हैं! इस तरह हाथ पर हाथ रखे आखिर कब तक बैठे रहेंगे? यदि आपको लगता है की मेरा कहना सही है तो आइये पहल करें, प्रयास करें, जिससे गरीब जनता के हितो को प्राथमिकता मिले. जिन्हें हम चुनकर अपने हितो का पक्ष रखने के लिए भेज रहे हैं वे वीआइपी सुविधाओं का आनंद लेकर गरीब जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं! यह अन्याय तो कतई सहनीय नहीं है.

Tuesday, March 30, 2010

विकास की धुंधली तस्वीर

आए दिन भारत के विकास की स्वर्णिम प्रतिमा दिखलाते आंकड़े तथा वक्तव्य सुनने और देखने को मिल जाते हैं। कहने को हमारी विकास दर बुलंदियों पर पहुँच रही है, भारत की आर्थिक वृद्धि दर के चालू वित्तीय वर्ष में 7.2% रहने के अनुमान हैं, इस मामले में चीन हम से आगे है और कहा जा रहा है की अगले चार वर्षो में हम चीन को भी पीछे छोड़ देंगे। यह 7.2% आर्थिक विकास की दर हम तब प्राप्त कर रहे हैं जबकि विश्व की मुख्य अर्थव्यवस्थाएं (भारत भी), भयावह आर्थिक मंदी के दुश्चक्र से गुजर रही थी। इन विपरीत परिस्थितियों में हमने विश्व की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ दिया यथा अमरीका 5.7% , जापान 4.8%, इंग्लेंड 0.1%, जर्मनी 0.7%, इटली 0.2% तथा रूस -8.9% के साथ हमसे पिछड़े। मजबूती से टिकी रही भारतीय अर्थव्यवस्था की भावी वर्षों - 2010-11 के लिए 8.5% एवं 11-12 के लिए 9% आर्थिक वृद्धि दर अनुमानित है। सामीक्षात्मक रूप से अर्थव्यवस्था में सकारात्मक सुधार के संकेत हैं।

आइये उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था के दुसरे पहलुओं पर भी गौर करते हैं। भारत में मुद्रास्फीति लगातार बढ़ रही है, जो की एशिया में सर्वाधिक है, कोई भी राष्ट्र यहाँ तक की दुनिया का सबसे धनाढ्य देश भी खाद्य पदार्थो की 18 फीसदी वृद्धि दर के साथ आगे नहीं बढ़ सकता।

आंकड़े बताते हैं की मंदी के बावजूद पिछले छः वर्षो में भारतीय शेयर बाजार 199.1 फीसदी चढ़ा, चालू वित्तीय वर्ष के दौरान हमारी प्रति व्यक्ति आय में 6.5 फीसदी बढ़त दर्ज की गई। यहाँ सवाल यह उठता है की भारत का 40 फीसदी गरीब जो तमाम प्रयासों के बावजूद दो वक्त के खाने का इंतजाम नहीं कर पाता है (और इनमे से अधिकांश भूखे सोने को विवश हैं), वह शेयर बाजार में क्या निवेश करता होगा? और उक्त आय की वृद्धि में क्या उसकी आय भी शामिल है? एक तरफ सरकारी कर्मचारियों पर छठे वेतन आयोग तथा हाल ही में मंहगाई भत्ते की बढ़ोतरी से विकास की रुपरेखा खींची जा रही है तो दूसरी और महानरेगा में कार्यरत जनता को न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम भुगतान का प्रावधान है और इसमें भी हैरत की कोई बात नहीं है की ये 100 रु भी आम जनता को नहीं मिलते हें। सर्वविदित हे, कलेक्टर से लेकर सरपंच तक सभी गरीब जनता के हक़ पर कुंडली मारे बेठे हें। जब पूरे कुए में ही भांग पड़ी हो तो उम्मीद भी क्या की जा सकती है?

भयावह मंदी के चलते छोटी-छोटी बचतों और सशक्त आंतरिक व्यवस्था के सहारे भारतीय अर्थव्यवस्था अन्य देशो की तुलना में मजबूती से टिकी रही। निम्न आय वर्ग की छोटी बचतें तथा छोटे निवेश हमारी अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। जैसे-जैसे इस वर्ग की आय बढती है, यह अपनी मूलभूत आवश्यकताओ से इतर आवश्यकताओ पर व्यय करता है। परन्तु बढती मंहगाई और निम्न आय वाले नौकरी पेशा वर्ग पर कड़े कर प्रावधानों ने इस वर्ग की कमर तोड़ दी है। दूसरी तरफ बड़े उद्यमी एवं व्यवसायी अपनी आय में भारी हेर-फेर कर लेते हैं, तमाम ऐसी राहें निकल लेते हैं जिनसे बढ़ी हुई आय को घटाकर दिखाया जा सके और इस तरह कर चोरी करते हैं। इनके पास अपने काले धन को ठिकाने लगाने के अनेक विकल्प मौजूद हैं। देश के सतत विकास हेतु होना यह चाहिए की दुसरे वर्ग पर लगाम कसते हुए निम्न आय वर्ग को कर प्रावधानों में रियायत दी जाए जिससे उनकी क्रय-शक्ति बढे तथा अर्थव्यवस्था में बचत तथा निवेश फले-फुले।

बढती मुद्रास्फीति गरीब तथा मध्यमवर्गीय लोगो को सर्वप्रथम अपने चंगुल में लेती है। ये ऐसे वर्ग हैं जो कभी अपने लिए भारी धन्माया नहीं जोड़ पाते और दो जून की रोटी के जुगाड़ में इनकी जिन्दगी गुजर जाती है। राजनीतिक प्रतिनिधि जिन्हें आम जनता यह सोचकर चुनावो में जीतती है की वे बाद में उनके हित में कार्य करेंगे, चुनाव जीतते ही आम से खास हो जाते हें। इतने विलम्ब के बावजूद भी बढती मंहगाई से निजात पाने के लिए संयुक्त इच्छाशक्ति नहीं नजर आ रही है। कोई मंहगाई पर चार लुभावनी बाते कहकर सत्तापक्ष की खिंचाई और वाहवाही लूटकर अपना वोट बैंक बढाने की फ़िराक में है तो कोई सार्वजानिक रूप से लाखो के नोटों की माला पहनकर न सिर्फ लोकतंत्र का मजाक बना रहा है बल्कि भूखी जनता के सामने सुख और वैभव का प्रदर्शन कर जनहितकारी बनने की हास्यास्पद कोशिश भी कर रहा है। दिलचस्प बात यह है की जानलेवा मंहगाई के इस दौर में तिल-तिल मरती जनता को समस्या के समाधान के बजाये गैरजिम्मेदार बयानबाजी सुनने को मिलती है जिससे उसकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर जाता है। सरकार जरुरी चीजो के दाम कम करने के लिए जो भी उपाय करती है उनकी जानकारी बाजार में पहले से ही हो जाती है इससे जमाखोरी बढती है जो कालाबाजारी को जन्म देती है. बिचोलियों एवं जमाखोरों की पौबारह हो रही है और आम जनता आभाव से ग्रस्त है।

पिछले वर्षो में डॉलर के मुकाबले रूपये के अवमूल्यन से हमारे आयात मंहगे हो रहे हैं। जनसंखया वृद्धि के मुताबिक खाद्यानो का उत्पादन न होने से हमारे आयात बढ़ रहे हैं। हम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में वस्तुओ की अधिक कीमतें चुकाने को बाध्य हैं। इससे आम जनता को भी वस्तुए मंहगी मिल रही हैं। सरकार आवश्यक वस्तुओ पर टैक्स कम रखकर लोगों को राहत दे सकती है।
यहाँ अपने विचारो को आपके साथ रखकर मैं इस समस्या की तरफ आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ. आइये इस मुद्दे पर बाते करे, समस्या पर सोचे और समाधान तलाशें. अर्थात मंहगाई की समस्या पर संयुक्तइच्छाशक्ति के साथ सोचने और समाधान जुटाने की जरुरत है नहीं तो यह देश के विकास की गति को लील जाएगी।